गौड़ वंश की महानतम रानी दुर्गावती की जीवनी

वीरता की बात करें तो हमारा भारत देश वीर पुरुषों और महिलाओं की गाथाओं का एक पूरा गढ़ है। 

ये भयानक विडंबना ही है कि देश भक्ति, मानव धर्म, शास्त्र और त्याग से भरी भारत देश के वीरों और वीरांगनाओं की कहानियों से अपरिचित हैं। मुगलों और ब्रिटिश काल का ब्यौरा तो स्कूली किताबों में भी भरा हुआ है। लेकिन वहां भी देश की मूल संस्कृति और वीरता की कहानियां बहुत कम पाई जाती हैं।

वीरांगनाओं की बातें तो कहीं हैं ही नहीं। मुगलों का विरोध केवल वीर पुरुषों ने ही नहीं बल्कि वीरांगनाओं ने भी उसी वीरता से किया हैं। 

शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप जैसा महान परिचय हैं।

गौड़ वंश की महानतम रानी दुर्गावती को उनकी वीरता और बलिदान के लिए याद किया जाता है। 

रानी दुर्गावती सुंदर, साहसी होने के साथ साथ प्रशासनिक कौशल वाली एक महान संरक्षिका थीं।

उन्होंने अपने पैतृक राजवंश की तरह अपने राज्य में बहुत सी झीलों का निर्माण करवाया। उन्होंने हमेशा विद्वानों का सम्मान किया और उन्हें संरक्षण भी प्रदान किया।

उन्होंने वल्लभ संप्रदाय के विट्ठलनाथ का अपने राज्य में सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उनसे दीक्षा प्राप्त की। 

जबलपुर में आज भी बेहद प्रचलित हैं रानी दुर्गावती की वीरता के किस्से। उन्होंने मुगलों से लोहा लेते हुए, अपनी मातृभूमि और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए दे दिया था अपना बलिदान।

आइए जानते हैं अदम्य साहस और बलिदान की यह गाथा…

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आरंभिक जीवन

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को दुर्गाष्टमी के दिन कालिंजर किले में हुआ था। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म हुआ था इसलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया। 

महोबा सम्राज्य के चंदेल राजपूत राजा शालिवाहन के परिवार में जन्मी राजकुमारी दुर्गावती राजा कीर्ति राय की इकलौती संतान थीं।

राजा कीर्ति राय ने अपनी पुत्री की परवरिश एक पुत्र की भांति ही की। बचपन से ही उन्हें अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा दी गई। वह बहुत साहसी थीं, 13-14 की उम्र में वह बड़े से बड़े जंगली जानवरों का शिकार बड़ी सरलता से कर लेती थीं।

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विवाह

राजकुमारी दुर्गावती की वीरता के किस्से दूर दूर तक विख्यात थे। गोंडवाना के वीर शासक दलपत शाह को जब राजकुमारी दुर्गावती की वीरता की खबर लगी तो उन्होंने अपने पुरोहित को राजा कीर्ति राय के समक्ष विवाह प्रस्ताव रखने कालिंजर भेजा।

उस समय राजा कीर्ति राय ने विवाह का प्रस्ताव ठुकरा दिया। राजा कीर्ति राय यह जानते थे कि राजा दलपत शाह उनकी अपेक्षा कुछ निजी श्रेणी के क्षत्रिय हैं। उन्होंने अन्य बातों की उपेक्षा करके इस विश्व विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

राजा कीर्ति राय के अहंकार को भरे जवाब को सुन कर राजा दलपत शाह को गुस्सा आ गया। और उन्होंने अपनी शक्तिशाली सेना लेकर कालिंजर पर हमला कर दिया।

इस युद्ध में राजा कीर्ति राय की हार हुई लेकिन दलपत शाह ने पराजित राजा के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया।

राजा कीर्ति राय को अपनी गलती का पछतावा हुआ और उन्होंने अपनी पुत्री दुर्गावती का विवाह विधिपूर्वक राजा दलपत शाह के साथ करवा दिया।

राजा दलपत शाह राजा संग्राम शाह के पुत्र थे। वह गोंडवाना राज्य के शासक थे। जो वर्तमान में मध्य प्रदेश का जबलपुर शहर है।

उनकी सेना इतनी विशाल थी कि मुसलमान शासक भी उन पर आक्रमण करने से डरता था।

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संभाली राज्य की कमान 

1542 ई. में गढ़ा सम्राज्य के राजा संग्राम शाह के बड़े पुत्र दलपत शाह के संग रानी दुर्गावती का विवाह हुआ जिससे महोबा के चंदेल और गढ़ मंडला राजवंश के राजगौंड का संबंध मजबूत हुआ। 

जिस कारण जब शेरशाह सूरी ने चंदेल शासक पर आक्रमण किया तब राजा कीर्ति राय को अपने दामाद दलपत शाह की मदद मिली। और इस युद्ध में शेरशाह सूरी मारा गया।

1554 ई. में रानी दुर्गावती ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम वीर नारायण रखा गया।

कुछ सालों पश्चात राजा दलपत शाह बीमार पड़ गए और 1550 ई. में उनका देहांत हो गया। जिससे रानी दुर्गावती शोक में आ गईं। उन्होंने सती होने का निर्णय लिया लेकिन राजा दलपत शाह के शुभचिंतकों ने उन्हें रोक लिया। 

युवराज वीर नारायण पिता की मृत्यु के समय केवल 5 वर्ष के थे। पुत्र की ओर देख कर रानी ने जीवन समाप्त करने का अपना निर्णय बदल लिया।

राज्य के उत्तराधिकारी युवराज वीर नारायण के अल्पवयस्क होने के कारण रानी ने स्वयं संरक्षिका के रूप में गोंडवाना साम्राज्य की बागडोर संभाली।

दीवान अधर कायस्थ और मंत्री मान ठाकुर ने प्रशासन को व्यवस्थित और कुशल रूप से चलाने में रानी की सहायता की।

रानी दुर्गावती ने अपने सम्पूर्ण सम्राज्य में व्यापार, शांति और सद्भावना को बढ़ावा दिया।

रानी दुर्गावती ने अपने राज्य की राजधानी सिंगोरगढ़ किले से चौरागढ़ किले में स्थानांतरित की। यह सतपुरा पर्वत श्रृंखला पर स्थित सामरिक महत्व का किला था।

शेरशाह सूरी की मृत्यु के बाद, शुजा खान ने मालवा पर कब्जा कर लिया। 1556 ई. में शुजा खान ने अपने बेटे बाज बहादुर को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। 

सिंहासन पर बैठते ही बाज बहादुर ने गोंडवाना पर आक्रमण कर दिया। लेकिन इस हमले में बाज बहादुर को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

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मुगल आक्रमण

1562 ई. में अकबर ने मालवा शासक बाजबहादुर को हरा कर मालवा पर अपना अधिकार कर लिया। जिससे रानी दुर्गावती का राज्य गोंडवाना की सीमा अब मुगल साम्राज्य को छू रही थी।

रानी दुर्गावती के समकालीन मुगल सेनापति ख्वाजा अब्दुल माजिद आसफ खान था,जिसने रीवा के राजा रामचंद्र को हराया था।

गोंडवाना की समृद्धि को देख उस राज्य पर भी अपना कब्जा करने के उद्देश्य से आसफ खान ने मुगल सम्राट अकबर की अनुमति प्राप्त कर गोंडवाना पर आक्रमण की योजना बनाई। यह हमला अकबर के विस्तारवाद और समाराज्य का परिणाम था।

रानी दुर्गावती को जब आसफ खान के आक्रमण करने की सूचना मिली तो उन्होंने अपने पूरे सामर्थ से अपने राज्य की रक्षा करने का निर्णय लिया। 

हालांकि उनके दीवान अधर कायस्थ ने मुगलों की ताकत और बहुत विशाल सेना की चेतावनी दी। लेकिन वीर रानी पीछे न हटी। उन्होंने अपमान पूर्वक जीने से सम्मानपूर्वक मरना कही बेहतर समझा।

अपने साम्राज्य की रक्षा की इस लड़ाई के लिए वह नरराई की ओर गईं जो एक तरफ पहाड़ी श्रृंखला और दूसरी तरफ दो नदियों गौर और नर्मदा के बीच स्थित था।

यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें एक ओर मुगलों के बड़ी संख्या में आधुनिक हथियारों से प्रशिक्षित सैनिक और दूसरी ओर रानी दुर्गावती के पुराने हथियारों के साथ प्रशिक्षित और कुछ अप्रशिक्षित सैनिक अपनी अपनी ओर से लड़ाई लड़ रहे थे।

रानी दुर्गावती के फौजदार अर्जुन दास युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। तब रानी ने अपनी सेना का स्वयं नेतृत्व किया। जैसे ही खाटी में दुश्मनों ने घुसने का प्रयास किया, रानी के सैनिकों ने उन पर हमला कर दिया। दोनों पक्ष ने अपने सैनिक खोए लेकिन रानी दुर्गावती ने मुगल सैनिकों को खाटी से खदेड़ दिया।

रानी दुर्गावती के क्षेत्र, एक औसत गैर-आदिवासी साम्राज्य की तुलना में काफी संघीय थे। उनके क्षेत्र के जिले, किले के आधार पर विभाजित थे, जहां प्रशासनिक इकाइयां गठित थी। उन पर या तो सीधे राजा द्वारा या अधीनस्थ सामंती प्रभुओं और कनिष्ठ राजाओं के माध्यम से नियंत्रण किया जाता था।

लगभग आधे गांव सामंतों के अधीन थे। इन स्थानीय राजाओं ने अधिकांश सैनिकों की भर्ती की और अपना योगदान दिया। इस विकेंद्रीकृत संरचना ने आक्रमणकारी मुगलों के विरुद्ध युद्ध के दौरान बहुत नुकसान किया।

इस स्तर को देखते हुए रानी ने अपने सलाहकारों के साथ अपनी रणनीति की समीक्षा की। वह रात में दुश्मनों पर गोरिल्ला आक्रमण कर उन्हें कमजोर कर देना चाहती थीं। लेकिन उन्हें यहां हतोत्साहित ही होना पड़ा क्योंकि उनके सरदारों ने उनकी यह सलाह नहीं मानी।

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रानी का बलिदान

अगली सुबह होने तक आसफ खान ने तोपे मंगवा ली।  रानी दुर्गावती ने हिम्मत नहीं हारी, ना ही डरी और ना ही हटी। वह अपने हाथी सरमन पर सवार हो युद्ध में आईं।

इस युद्ध में उनके पुत्र वीर नारायण ने भी भाग लिया। उन्होंने मुगलों को तीन बार पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। लेकिन अंत में वह घायल हो गए और फिर उन्हें सुरक्षित स्थान पर भेज दिया गया।

रानी दुर्गावती ने अपनी रणनीतियों और युद्ध कौशलता से मुगलों को टक्कर दी। लेकिन युद्ध के दौरान कान के पास तीर लगने से वह घायल हो गईं थीं। एक ओर तीर उनकी गर्दन के पास लगा और वह बेहोश हो गईं। जब होश आया तो हार नजदीक थी। उनके महावत ने उन्हें युद्ध का मैदान छोड़ने की सलाह दी।

लेकिन वीरों को कभी पीछे हटते सुना है क्या। कभी नही, बस कुछ ऐसी ही थी वीरांगना रानी दुर्गावती।

वह इन मुगलों के हाथ नहीं आना चाहती थीं और अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी कटार निकाली और अपने ही सीने में मार ली।

24 जून 1564 में वीरांगना रानी दुर्गावती ने अपना बलिदान दे दिया। 

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यादें 

जबलपुर में मदन महल किला रानी दुर्गावती और उनके बेटे युवराज वीर नारायण से संबंधित है।

साल 1983 में मध्य प्रदेश सरकार ने उनकी स्मृति में जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय किया।

भारत सरकार द्वारा 24 जून 1988 को श्रद्धांजलि स्वरूप डाक टिकट जारी की।

उनके सम्मान में जबलपुर जंक्शन और जम्मूतवी के बीच चलती ट्रेन का नाम दुर्गावती एक्सप्रेस (11449/ 11450) रखा गया।

भारतीय तट रक्षक ने 14 जुलाई 2018 को तीसरा इनशोर पेट्रोल वेसल (IPV), साधिकार ICGS रानी दुर्गावती को चालू किया।

जिस स्थान पर रानी दुर्गावती ने अपना बलिदान दिया था, वह सदैव स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत रहा।

उनके बलिदान को हर पीढ़ी जान सके और उनकी कहानी से सीख ले, इसलिए 24 जून को प्रतिवर्ष बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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