para athelete deepa malik

एक महिला जिसने अपने शरीर का निचला भाग सुन्न हो जाने पर भी अपने हौसलों को बुलंदी दी। वह शॉटपुट (गोला फेंक) एवम् जेवलिन थ्रो से जुड़ी विकलांग भारतीय महिला खिलाड़ी हैं। साथ ही साथ वह तैराकी और मोटर रेसिंग जैसी प्रतिस्पर्धाओं में भी हिस्सा लेती रही हैं।

केवल एक पैरा एथलीट ही नहीं बल्की साहसी बाइकर, कुशल तैराक, कार रैलीकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, प्रेरक वक्ता, सफल उद्यमी और भारतीय जनता पार्टी की सदस्य भी हैं।

हम बात कर रहे है भारतीय खिलाड़ी दीपा मलिक की, जो ग्रीष्मकालीन पैरालंपिक रियो 2016 में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पैरा एथलीट हैं। 

भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री, अर्जुन पुरस्कार और राजीव गांधी खेल पुरस्कार जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को कई बार गौरवान्वित किया।

उन्हें 5 राष्ट्रपति पुरस्कार, 4 लिम्का विश्व रिकॉर्ड, 3 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, 68 राष्ट्रीय और राज्य पदक, 23 अंतर्राष्ट्रीय पदक से सम्मानित किया गया है।

दीपा मलिक हिमालयन मोटरस्पोर्ट्स एसोसिएशन (HMA) और फेडरेशन ऑफ मोटरस्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया (FMSCI) के साथ भी जुड़ी हुई हैं।

वह पहली पैराप्लेजिक महिला बाइकर, तैराक, रैलिस्ट और पैरालंपिक पदक विजेता हैं। 

उन्होंने अपनी विकलांगता में भी क्षमता को आगे बढ़ाया, हार कर बैठी न रहीं। विकलांगता के पीछे छिपी क्षमता को पहचानना कठिन है और इतनी हिम्मत भी हर किसी में नहीं होती। 

कठिनाइयों को पार करते हुए विकलांगता में क्षमता को उन्होंने अपने जीवन का अभियान बना लिया।

दीपा मलिक अपने फाउंडेशन व्हीलिंग हैप्पीनेस के माध्यम से विकलांग लोगों को सक्षम बनाने के प्रयास में निरंतर लगी हुई हैं।

11 अक्टूबर 2019, को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर वह लोकप्रिय भारतीय टीवी गेम शो “कौन बनेगा करोड़पति” में दिखाई दीं।

आइए जानते हैं दीपा मलिक की इच्छाशक्ति, साहस व संघर्ष की दिलचस्प कहानी…

प्रारंभिक जीवन

दीपा मलिक का जन्म 30 सितम्बर 1970 में, सोनीपत, हरियाणा में हुआ था। उनके पिता बाल कृष्ण नागपाल ने भारतीय सेना में अपनी सेवा दी है। उनकी माता जी का नाम वीणा नागपाल है। उनके भाई विक्रम नागपाल सेना में ब्रिगेडियर हैं।

वह बचपन से ही तीव्र और खेलों के प्रति प्रोत्साहित रहीं। 

दीपा जी जब 5 वर्ष की थी तब उन्हें रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर हो जाने के कारण 3 साल तक कष्टदायक इलाज से जूझना पड़ा। उपचार सफल रहा किंतु उन्हें आक्रामक फिजियोथेरिपी से गुजरना पड़ा।

शिक्षा और विवाह 

वह केंद्रीय विद्यालय की छात्रवृत्ति धारी छात्रा रहीं। उन्होंने सोफिया कॉलेज, अजमेर से इंग्लिश लिट्रेचर में ग्रैजुएशन की डिग्री प्राप्त की है। उन्हें बाइक चलाने का बहुत शौक रहा। उन्हीं की तरह बाइक के प्रति उत्साहित विक्रम सिंह मलिक से उन्हें प्रेम हुआ। 

विक्रम मलिक ने उन्हें बाइक भेट करते हुए प्रपोज किया था। 27 जून 1989, को आर्मी ऑफिसर विक्रम सिंह मलिक साथ वह विवाह के बंधन में बंधी। 

उनकी दो बेटियां अंबिका मलिक और देविका मलिक हैं। उनकी बेटी देविका में छोटे पर ही विकलांगता के लक्षण दिखे। हेमिप्लेगिया के लक्षण के कारण देविका के शरीर का बायां भाग  प्रभावित हो गया। लेकिन हिम्मत में अपनी मां दीपा मलिक से बिल्कुल भी कम नहीं हैं। वह भी पैरा एथलीट हैं।

जब मार गया लकवा

वर्ष 1999 में, 29 वर्षीय दीपा मलिक को एक बार फिर से रीढ़ की हड्डी के ट्यूमर से लड़ना पड़ा। डॉक्टरों के पास ऑपरेशन करने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं बचा था। साथ ही उन्होंने इस बात से भी सचेत कर दिया था कि ऑपरेशन के बाद वह चलने में असमर्थ हो जाएंगी।

उस दौरान उनके पति कारगिल युद्ध में देश के लिए जंग लड़ रहे थे।

ट्यूमर को सफलता पूर्वक हटाने के लिए उनकी 3 सर्जरी हुई, जिसमे लगभग 183 टांके लगे। ट्यूमर तो नष्ट हो गया लेकिन उनका कमर से नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। सर्जरी के बाद 6 सालों तक उन्हें फिजियोथेरिपी का सामना करना पड़ा।

दीपा मलिक का हौसला ऐसे ही इतना दृढ़ नही है बल्कि इसका श्रेय उनके पति को भी जाता है। कारगिल युद्ध के बाद उनके पति विक्रम सिंह मलिक ने अपनी आर्मी की नौकरी छोड़ दी। और अपनी पत्नी की हिम्मत बन चट्टान से खड़े हो गए।

2003 में जब उनके पति दौरे पर गए हुए थे, तब उन्होंने अहमदाबाद में एक रेस्टोरेंट खोला। उन्होंने युवाओं को रोजगार दिया और साथ ही उन्हें शिक्षा की ओर अग्रसर किया। अपने खेल जीवन को दिशा देने हेतु उन्होंने 2010 में रेस्टोरेंट बंद कर दिया।

खेलों की ओर किया रुख

ट्यूमर से लड़ाई जीत 36 साल की उम्र में उन्होंने खेलों की और अपनी रुचि दिखाई। सभी सामाजिक मापदंडों को तोड़ वह हर तूफान से टकराने को तैयार थीं। 

वैसे भी जिस उम्र में एथलीट सेवानिर्वित होने की सोचते हैं उस उम्र में तो दीपा मलिक ने अपनी शुरुवात आरंभ ही की।

अपने कंधे और हाथों को मजबूत बनाने के लिए उन्होंने तैराकी शुरू की। उनके उत्साह और तैराकी में कुशलता को देखते हुए उनके प्रशिक्षक ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर की तैराकी प्रतियोगिताओं में भाग लेने का सुझाव दिया।

दीपा मलिक ने अपने हौसलों से साबित कर दिया की विकलांगता केवल मन की स्थिति भर है। 2008 में उन्होंने धारा के विपरीत प्रवाह के साथ यमुना नदी की 1 किमी दूरी तैर कर तय की।

साल 2009 में वह पैरा तैराकी से पैरा एथलीट की और बढ़ी। उन्होंने शॉटपुट, डिस्कस थ्रो, जैवलिन जैसे खेलों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाग लिया। 

दीपा मलिक ने 2016 में, रियो ओलंपिक में शॉटपुट F-53 स्पर्धा में 4.61 मीटर के अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ रजत पदक जीत कर खेल के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया। 

तब तक उन्होंने अपनी योग्यता और आश्चर्यजनक प्रदर्शन से तैराकी, शॉटपुट, जेवेलिन थ्रो खेलों के साथ साथ बाइकर के तौर पर 54 राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम दर्ज कर लिए थे।

साल 2018 में उन्होंने दुबई में आयोजित पैरा एथलेटिक ग्रांड प्रिक्स में F-53/54 जेवलिन स्पर्धा में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। 

वह वर्तमान में F-53 श्रेणी में विश्व की नंबर वन खिलाड़ी हैं।

उन्होंने एशियाई पैरा गेम्स 2018 में एक नया एशियाई रिकॉर्ड बनाया और लगातार 3 एशियाई पैरा गेम्स (2010, 2014, 2018) में पदक जीतने वाली एकमात्र भारतीय महिला हैं।

दीपा मलिक 2013 में, आईपीसी वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप, लियॉन में योग्यता प्राप्त करने वाली एकमात्र भारतीय महिला हैं।

मोटर स्पोर्ट्स

वह हिमालयन मोटरस्पोर्ट्स एसोसिएशन के साथ जुड़ी। उन्होंने शून्य से नीचे के तापमान में 8 दिनों तक 18,000 फीट ऊंची चढ़ाई के साथ 17,000 किमी. की यात्रा तय की।

वह फेडरेशन ऑफ मोटरस्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया द्वारा आधिकारिक रैली लाइसेंस पाने वाली पहली विकलांग व्यक्ति हैं। 

उन्होंने सबसे कठिन कार रैलियों में भाग लिया है। साल 2009 में रैड-डी-हिमालय और 2010 में डेजर्ट स्टॉर्म जैसी सुदूर रैलियों में नेविगेटर और ड्राइवर के तौर पर हिस्सा लेने वाली वह पहली विकलांग व्यक्ति बनी।

मोटरस्पोर्ट्स में शामिल होने का उनका उद्देश्य इस बात के प्रति प्रोत्साहित व जागरूकता बढ़ाना रहा कि शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति आधिकारिक लाइसेंस प्राप्त कर सकते हैं। और शारीरिक तौर पर असक्षम व्यक्ति ड्राइविंग के माध्यम से स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता को जगा सकते हैं। इस मुद्दे पर जोर देने के लिए उन्होंने कई रैलियां की हैं।

सम्मान और उपलब्धियां 

दीपा मलिक के उत्साह और आत्मविश्वास को बढ़ाते हुए भारतीय सरकार ने 2012 में सर्वोच्च खेल सम्मान “अर्जुन पुरस्कार” से तैराकी में उनके अद्भुत प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया।

साल 2014 में उन्हें राष्ट्रपति रोल मॉडल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उन्हें अंतर्राष्ट्रीय पैरालंपिक समिति द्वारा दुनिया की 10 सबसे प्रेरणादायक महिला पैरा-एथलीटों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया गया। उन्हें ग्रेट एशिया वुमेन अचीवर्स अवार्ड्स 2017 द्वारा शीर्ष 10 एशियाई महिला अधिनायकों में से एक के रूप में स्थान दिया गया है।

उनकी उपलब्धियों के लिए साल 2017 में उन्हें प्रतिष्ठित “पद्मश्री पुरस्कार” से सम्मानित किया गया।

स्पोर्ट स्टार एसेस अवॉर्ड समारोह में उन्हें वर्ष 2018 में पैरा एथलीट के रूप में नामित किया गया।

साल 2019 में उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार (अब नाम बदलकर मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार कर दिया गया है) से सम्मानित किया गया।

भारत और न्यूजीलैंड के लोगों के बीच द्विपक्षीय मैत्रीपूर्ण संबंधों को मजबूत करने के लिए, साल 2019 के लिए दीपा मलिक को पीएम जैकिंडा अर्डर्न द्वारा न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री सर एडमंड हिलेरी की फेलो के लिए चुना गया।

वह एक प्रेरक वक्ता भी हैं। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार परिषद के ‘असाधारण वक्ता पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

दीपा मलिक को अंतर्राष्ट्रीय पैरालंपिक समिति द्वारा वुमन ऑफ द इयर 2019 के रूप में सम्मान दिया गया। 

उनके नेतृत्व में अब तक के इतिहास में भारतीय टीम ने टोक्यो पैरालंपिक में सबसे अधिक पदक जीते। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए दीपा मलिक को एशियाई अवॉर्ड 2022 से सम्मानित किया गया है। यह पैरास्पोर्ट्स में भाग लेने वाले सभी एशियाई देशों में सर्वोच्च सम्मान होता है।

साल 2006 में उन्हें महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्वावलंबन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

दीपा मालिक को 2009-10 के महाराष्ट्र छत्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

साल 2008 में, उन्हें हरियाणा कर्मभूमि पुरस्कार से नवाजा गया।

महिला एवम् बाल विकास मंत्रालय द्वारा उन्हें प्रथम महिला पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

एडवेंचर श्रेणी में उनके नाम चार लिम्का वर्ल्ड रिकॉर्ड हैं। 

वह विकलांगता श्रेणी F-53 में अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों में देश का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिला हैं।

दीपा मलिक को साहसिक खेलों के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए आईटीएम विश्वविद्यालय द्वारा मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया है। और सामाजिक कार्यों में उनके योगदान के सम्मान में रैफल्स विश्वविद्यालयद्वारा एक और मानद डॉक्टरेट की उपाधि से अलंकृत किया गया।

सामाजिक भूमिका 

खेल मंत्रालय की ओर से योजना आयोग मानव संसाधन विकास प्रभाग द्वारा नामित खेल और शारीरिक शिक्षा पर, दीपा मलिक ने 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) के निर्माण के लिए कार्य समूह की सदस्य के रूप में शारीरिक रूप से विगलांग व्यक्तियों के हित में खेलो की बेहतर स्थिति के लिए महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई।

वह नई दिल्ली नगर निगम की “स्वच्छ भारत” की ब्रांड एम्बेसडर हैं। साथ ही वह आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय की “स्मॉर्ट सिटीज” परियोजना के लिए विकलांगता समावेशी सुलभ बुनियादी ढांचे की विशेषज्ञ सलाहकार भी हैं।

उन्होंने 2013 में, इंडियन ग्रांड प्रिक्स, बुद्धा इंटरनेशन सर्किट में आयोजित ग्रिड और राष्ट्रीयगान समारोह में भाग लिया।

साल 2020 में उन्हें भारत की पैरालंपिक समिति की अध्यक्ष के रूप में चुना गया।

वह हरियाणा रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण के लिए जनसंपर्क और शिकायतों को भी संभाल रही हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता

दीपा मलिक अपनी बेटी देविका मलिक जो कि पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता हैं के साथ मिलकर व्हीलिंग हैप्पीनेस फाउंडेशन के माध्यम से शारिरिक असक्षमता से लड़ते लोगों की सहायता करती हैं।

इस फाउंडेशन का उद्देश्य चिकित्सा उपकरण और वित्तीय सहायता प्रदान करके विकलांग व्यक्तियों की मदद करना है।

दीपा मालिक अक्षमता से लड़ते व्यक्तियों के भावनात्मक स्वस्थ्य को बढ़ाने, उनकी खेलों में रूचि बढ़ाने, मोटर स्पोर्ट्स और साथ ही साहसिक गतिविधियों के द्वारा महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए व्हीलिंग हैप्पीनेस फाउंडेशन के माध्यम से हर दिन कार्यरत हैं।

वह पैरा स्पोर्ट्स प्रशिक्षण और खेल उपकरण आवश्यकताओं के लिए सहायता प्रदान करती हैं।

वह साथ-साथ विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों में विकलांगता खेल जागरूकता फैलाने में भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रही हैं।

वह एयरलाइन कर्मचारियों को विकलांगता संवेदीकरण प्रशिक्षण भी प्रदान करती हैं।

अन्य पुरस्कार

  • रोटरी वुमन ऑफ़ द ईयर अवार्ड (2007)
  • राष्ट्र गौरव पुरस्कार (2009)
  • नारी गौरव पुरस्कार (2009)
  • गुरु गोबिंद शौर्य पुरस्कार (2009)
  • जिला खेल पुरस्कार अहमदनगर (2010)
  • कैंसर रोगी सहायता एसोसिएशन नई दिल्ली द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस प्रशंसा पुरस्कार (2011)
  • श्री शक्ति पुरस्कार CARE (2011)
  • बत्रा पॉजिटिव हेल्थ हीरो अवार्ड (2012)
  •  AWWA एक्सीलेंस अवार्ड फॉर स्पोर्ट (2012)
  • मीडिया पीस एंड एक्सीलेंस अवार्ड फॉर स्पोर्ट (2012)
  • महाराणा मेवाड़ अरावली खेल पुरस्कार (2012)
  • मिसाल-ए-हिम्मत पुरस्कार (2012)
  • अमेज़िंग इंडियन अवार्ड्स टाइम्स नाउ (2013)
  • कैविंकरे नेशनल एबिलिटी मास्टरी अवार्ड (2013)
  • कर्मवीर चक्र पुरस्कार (2013)
  • “वीमेन वी लव श्रेणी” में लोरियल फेमिना अवार्ड्स 2013 के लिए नामांकित हुई।
  • WCRC लीडर्स एशिया एक्सीलेंस अवार्ड (2014)
  • लिम्का पीपल ऑफ द ईयर पुरस्कार (2014)
  • iCONGO करमवीर पुरस्कार (2014)

रिकॉर्ड और रैंकिंग 

दीपा मलिक ने जेवलिन एफ-53 श्रेणी में एक आधिकारिक आईपीसी एशियाई रिकॉर्ड बनाया, जिसके लिए वह मिल्खा सिंह और पीटीयूशा द्वारा सम्मानित की गईं।

उन्होंने एफ-53 श्रेणी में तीनों प्रकार के थ्रो (डिस्कस, जेवलिन, शॉट-पुट) में राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम किए।

उन्होंने एस-1 तैराकी श्रेणी में तीन तरह से बैक स्ट्रोक, ब्रेस्ट स्ट्रोक, फ्री स्टाइल में राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।

वह विश्व रैंकिंग 2010-12 में दूसरा शॉट-पुट, तीसरा-डिस्कस, तीसरा जेवलिन स्थानों पर रहीं।

एशियाई रैंकिंग 2010-12 में वह तीनों थ्रो में प्रथम श्रेणी पर रहीं।

लिम्का वर्ल्ड रिकॉर्ड्स

पहला लिम्का वर्ल्ड रिकॉर्ड उन्होंने 2008 में इलाहाबाद में धारा के विपरीत यमुना नदी में 1 किमी तक तैर कर कायम किया।

दूसरा – विशेष बाइक की सवारी (2009)

तीसरा – साल 2011 में लेह-लद्दाख की सबसे ऊंची मोटर योग्य सड़कों पर नौ दिनों में नौ ऊंचाई वाले मार्गों पर ड्राइविंग। वह अपनी विकलांगता के बावजूद इस तरह की यात्रा करने वाली दुनिया की पहली महिला हैं ।

चौथा – साल 2013 में पैराप्लेजिक महिला द्वारा की गई सबसे लंबी पैन-इंडिया ड्राइव, चेन्नई-दिल्ली 3278 किमी 

उन्होंने हर क्षेत्र में अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन ही दिया और समाज में आज उदाहरण पेश कर दिया कि सफलता की राह में दिखती हर बाधा को टूल की तरह प्रयोग करना चाहिए। 

विकलांगता और कायरता में बहुत बड़ा अंतर होता है। कायरता आपको बौद्धिक रूप से विकलांग बना सकती हैं। साहस भरा जज्बा और आत्मविश्वास शारीरिक विकलांगता के बाद भी उत्कृष्टता की ओर बढ़ाने में सक्षम है।

Jagdisha: दीपा मलिक आपके उमदा हौसलों और बुलंद इरादो को हमारा सलाम।

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