रेणुका रे एक प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता, एक उग्र स्वतंत्रता सेनानी, एक प्रसिद्ध लेखिका, राजनीतिज्ञ और संविधान सभा की सदस्य थीं।

संविधान को बनाने में जितना पुरुषों का योगदान रहा, महिलाओं का भी उतना ही योगदान रहा है। संविधान सभा के कुल सदस्यों में 15 महिलाएं भी शामिल थीं, इन्हीं 15 महिलाओं में से एक थीं रेणुका रे। 

वह अपनी सामाजिक-आर्थिक समझ के आधार पर एक उत्कृष्ट सांसद के रूप में आज भी जानी जाती हैं।

उनके कार्यों को सराहते हुए और उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए, भारत सरकार ने उन्हें साल 1988 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।

रेणुका रे सोलह 16 की कम उम्र में महात्मा गांधी के संपर्क में आईं और उनसे काफी प्रभावित हुईं। गांधीजी ने जब ब्रिटिश भारतीय शिक्षा प्रणाली का बहिष्कार करने के लिए कहा तब उन्होंने कॉलेज छोड़ने का निर्णय ले लिया।  

हालाँकि, बाद में जब उनके माता-पिता ने गांधीजी से आग्रह किया तो उन्होंने रेणुका रे को शिक्षित कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता के बारे में समझाया। फिर वह आगे की पढ़ाई के लिए लंदन गईं। और उन्होंने साल 1921 में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में दाखिला लिया। 

25 साल की कम उम्र में उनकेे माता-पिता ने उनका विवाह सत्येंद्र नाथ रे से करवा दिया। सत्येंद्र रे ने देश के कई जिलों में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। 

उन्होंने स्त्री-पुरुष समानता के सवाल पर रेणुका रे को मौलिक नज़रिये विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया। 

रेणुका रे जब राहत और पुर्नवास मंत्री बनीं तब सत्येद्रनाथ रे ने बतौर सचिव उनके साथ काम किया।

आइये जानते हैं इस स्वतंत्रता सेनानी व राजनितिज्ञ महिला के विषय में…

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प्रारंभिक जीवन

रेणुका रे एक प्रख्यात परिवार से आती हैं। उनका जन्म 1904 में बंगाल में हुआ था। उनके पिता सतीश चंद्र मुखर्जी एक आईसीएस अधिकारी थे। उनकी माँ चारुलता मुखर्जी एक सामाजिक कार्यकर्ता और अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की सदस्य थीं।

उनके नाना, प्रो. पी के रॉय ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डी.फिल प्राप्त करने वाले पहले भारतीय थे। साथ ही वे प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता के पहले भारतीय प्राचार्य भी थे। 

उनकी नानी, सरला रॉय एक प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जिन्होंने महिलाओं की मुक्ति के लिए काम किया। उन्होंने गोखले मेमोरियल स्कूल और कॉलेज की स्थापना की। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सीनेट की सदस्य बनने वाली पहली भारतीय महिला थीं।

उनकी नानी, सरला रॉय प्रसिद्ध ब्रह्म सुधारक दुर्गामोहन दास की बेटी और लेडी अबला बोस की बहन और प्रतिष्ठित दून स्कूल के संस्थापक एस आर दास और देशबंधु सी आर दास के चचेरी बहन थीं।

उनके भाई-बहनों में, सुब्रतो मुखर्जी भारतीय वायु सेना के पहले एयर चीफ मार्शल थे। उनका विवाह विजया लक्ष्मी पंडित की भतीजी शारदा मुखर्जी से हुआ था। 

उनके भाई, प्रोसेंटो मुखर्जी भारतीय रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष थे, और उनकी शादी केशब चंद्र सेन की पोती वायलेट से हुई थी। उनकी भतीजी, गीती सेन एक प्रसिद्ध कला इतिहासकार और आईआईसी, क्वार्टरली की प्रधान संपादक हैं। और उन्होंने प्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म निर्देशक मुजफ्फर अली से शादी की है।

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करियर

जब रेणुका रे भारत लौटीं, तो वे अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में शामिल हो गईं। उन्होंने माता-पिता की संपत्ति में महिलाओं के अधिकारों और विरासत के अधिकारों की मांग की और उसके लिए अथक प्रयास किया। 

महिलाओं से संबंधित कानूनों में संभावित कानूनी परिवर्तनों पर चर्चा करने के लिए उन्हें एक स्वतंत्र सदस्य के रूप में नामित किया गया था। साल 1932 में, वह अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष बनीं।

साल 1943 में उन्हें भारत की महिलाओं के प्रतिनिधि के रूप में केंद्रीय विधान सभा के लिए नामित किया गया था। वह 1946-47 में भारत की संविधान सभा की सदस्य भी थीं।

वह दुबारा 1953-54 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष बनीं।

उन्हें 1952-57 के वर्षों में पश्चिम बंगाल के राहत और पुनर्वास मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया था। अपने मंत्री पद से मुक्त होने के बाद, वह 1957-1967 तक मालदा लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा सदस्य भी रहीं। 

साल 1959 में उन्होंने समाज कल्याण और पिछड़े वर्गों के कल्याण हेतु एक समिति का नेतृत्व किया, जिसे रेणुका रे समिति के नाम से जाना जाता है।

उन्होंने योजना आयोग और शांति निकेतन के विश्व भारती विश्वविद्यालय में भी कार्य किया।

उन्होंने अखिल बंगाल महिला संघ और महिला समन्वय परिषद की स्थापना की। 

उन्होंने अपनी जीवनी पर एक पुस्तक लिखी है, उनके संस्मरण का शीर्षक है ‘माई रिमिनिसेन्स: सोशल डेवलपमेंट ड्यूरिंग द गांधीयन एरा एंड आफ्टर।’ रेणुका रे की इस किताब में भारत में महिलाओं की स्थिति का जिक्र है। भारत के इतिहास में हुए राष्ट्रवादी आंदोलन के विकास और विभाजन पर भी पुस्तक में विस्तृत चर्चा है।

किताब के एक हिस्से में पूर्वी क्षेत्र पर विभाजन के प्रभाव के विषय में है, जब वह पांच साल तक पश्चिम बंगाल में पुनर्वास और राहत मंत्री थीं। 

अपने राजनीतिक सफर के दौरान ही उन्होंने महसूस किया कि राजनीति में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण का मुद्दा कितना आवश्यक और उपयोगी है। वह पहले महिला आरक्षण की विरोधी थी लेकिन बाद में उन्होंने महिला आरक्षण का विरोध नहीं किया।

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सामाजिक कार्य

1930-34 के दौरान उन्होंनेे झारखंड के कोयला खदानों का दौरा किया और वहां महिलाएं जिन परिस्थितियों में काम करती थीं, उस पर एक रिपोर्ट पेश की जिसको महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया। 

साल 1940 के दौर में रेणुका रे को महिलाओं से संबंधित कानूनों में संभावित वैधानिक परिवर्तनों के बारे में चर्चा करने के लिए अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की प्रतिनिधि की हैसियत से केंद्रीय विधानसभा में स्वतंत्र सदस्य के रूप में नामित किया गया।

उनके साथ राधाबाई सुब्बारायन कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। हिंदू महिला उत्तराधिकार विधेयक के लिए उन्होंने शुरुआती संघर्ष किया जिसमें वह सफल नहीं हो सकीं। 

जमींदारी प्रथा के निवारण के लिए भी वह काफी क्रांतिकारी बदलाव चाहती थीं लेकिन संविधान सभा के दृष्टिकोण से वह काफी निराश थी।

उन्होंने 1952-1957 तक पश्चिम बंगाल में शरणार्थी और पुनर्वास मंत्री के रूप में अपनी सेवा दी। पश्चिम बंगाल और पूर्वी बंगाल के बीच देश के निवासियों की पंजाब के तरह अदला-बदली नहीं हुई थी, इसलिए सरकार हमेशा से पश्चिम बंगाल के शरणार्थी शिवरों के बहुत कम आर्थिक मदद भेजती थी। 

यह रेणुका रे का संगठन नेतृत्व था कि उन्होंने शरणार्थी शिवरों में चलाए जा रहे स्कूलों से शत-प्रतिशत साक्षरता लोगों को प्रदान की।

रेणुका मालदा जिले के रतुआ निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर ससंद पहुँची। 

योजना आयोग पर आधारित राष्ट्रीय विकास परिषद की योजना परियोजना समिति के अंतर्गत समाज-कल्याण और पिछड़ी जातियों के कल्याण के लिए अध्ययन दल के नेता के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई। दो साल के अध्ययन के बाद उन्होंने गृह मंत्रालय से पिछड़ा आयोग बनाने का समर्थन किया।

कांग्रेस के अंदर हो रहे परिवर्तनों से वह परेशान थीं। उनका नाम जब पश्चिम बंगाल के उम्मीदवारों की सूची से हटा दिया गया, तब नेहरू जी ने उन्हें राजसभा से अपना नामांकन स्वीकार करने के लिए कहा।  

रेणुका रे शुरू से एक देश में दो सदन के विचार से सहमत नहीं थी वह इसको एक गरीब देश पर अतिरिक्त खर्च का दवाब मानती थीं। 

उन्होंने अपने सिद्धांत से समझौता नहीं किया और महिलाओं के सामाजिक सुधार के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।

साथ ही उन्होंने शारदा विधेयक का विरोध किया था जिसमें लड़कियों की शादी की उम्र 14 साल और लड़कों की 18 साल तय की गई थी। 

रेणुका ये ने एक समान व्यक्तिगत कानूनी संहिता के लिए लड़ाई लड़ी, यह दावा करते हुए कि भारतीय महिलाओं की स्थिति दुनिया में सबसे अन्यायपूर्ण है।

साल 1997 में 93 की उम्र में उनका निधन हो गया।

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Jagdisha सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्रता सेनानी, लेखिका व राजनितिज्ञ रेणुका रे को हमारा शत शत नमन।

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