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राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की रिपोर्ट में देश की सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार महिलाओं से जुड़े कई अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं | 

यह सर्वे दो चरणों में किया गया है | पहला चरण 17 जून 2019 से 30 जनवरी 2020 तक किया गया | पहले चरण में 17 राज्य और 5 केंद्र शासित प्रदेशों ने भाग लिया | दूसरा चरण 2 जनवरी 2020 से 30 अप्रैल 2021 के दौरान हुआ जिसमें 11 राज्य और तीन केंद्र शासित राज्यों ने हिस्सा लिया | 

नई रिपोर्ट के अनुसार भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति के विषय में क्या कहते है, ये आंकड़े आइए जानते है…

महिलाएं पीरियड के दौरान करती है कपड़े का इस्तेमाल

एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट की मानें तो, 15 से 24 साल की उम्र की लगभग 50% लड़कियां/महिलाएं अभी भी पीरियड के दौरान सेनेटरी नैपकिन के स्थान पर कपड़े का इस्तेमाल करती हैं |

इसका कारण सबसे ऊपर अगर मुझे रखने को कहा जाएं तो मैं शर्म, पीरियड को लेकर भ्रांतियां और जागरूकता के अभाव को ही कहूँगी |

रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि अगर महिलाएं अशुद्ध कपड़े का पुन: उपयोग करती हैं, तो इससे कई स्थानीय संक्रमणों का खतरा बढ़ जाता है | 

रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 से 24 उम्र वर्ग की भारत में 64% महिलाएं सेनेटरी नैपकिन, 50% कपड़े और 15% स्थानीय तौर से तैयार नैपकिन का उपयोग करती हैं | 

कुल मिलाकर, इस आयु वर्ग की 78% महिलाएं पीरियड से बचाव के लिए एक स्वच्छ विधि का उपयोग करती हैं | स्थानीय रूप से तैयार किए गए नैपकिन, सेनेटरी नैपकिन, टैम्पोन और मेन्स्ट्रुअल कप पीरियड के लिए स्वच्छ तरीके माने जाते हैं |

रिपोर्ट के अनुसार भारत में 12 और उससे अधिक उम्र की स्कूल जाने वाली लड़कियां बिना स्कूल जाने वाली लड़कियों की तुलना में पीरियड स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग है |

यह दर स्कूल जाने वाली लड़कियों में 90% है जबकि स्कूल न जाने लड़कियों में केवल 44% है | 

यदि पीरियड स्वच्छता दर की बात भारत के राज्यों के अनुसार करे तो बिहार 59%, मध्य प्रदेश 61% और मेघालय 65% में सबसे कम महिलाएं पीरियड के दौरान स्वच्छ तरीकों को अपना पाती हैं |

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25% महिलाओं की कम उम्र में हो जाती है शादी

एनएफएचएस-5 के आंकड़ों के अनुसार भारत में 18 से 29 साल की उम्र वाली महिलाओं में 25% महिलाएं ऐसी हैं जिनकी शादी 18 साल के होने से पहले ही कर दी गई थी | 

इन आंकड़ों के अनुसार 2019-21 के सर्वेक्षण में महिलाओं में यह दर 25% है | तो वही 18 से 29 आयु के पुरुषों की कानूनन तय उम्र 21 साल से पहले ही शादी की दर 15% है |

पश्चिम बंगाल और बिहार में बाल विवाह का सबसे अधिक प्रचलन था, और यह एनएफएचएस -4 के बाद से अपरिवर्तित रहा है |

पश्चिम बंगाल में 42% महिलाएं ऐसी हैं जिनकी शादी जल्दी ही करा दी गई | वहीं, बिहार में यह आंकड़ा 40% और त्रिपुरा 39% है | 

वहीं झारखंड में 35% यानी एक तिहाई महिलाओं की शादी कानूनन तय उम्र में पहुंचने से पहले ही कर दी गई | आंध्र प्रदेश में यह दर 33% है |

कानून द्वारा तय न्यूनतम उम्र से पहली शादी करने की दर असम में 32%, दादर नगर हवेली और दमन दीव में 28%, तेलंगाना में 27%, मध्य प्रदेश और राजस्थान में 25% है | 

सर्वेक्षण के अनुसार कानूनी उम्र से पहले महिलाओं की शादी के संदर्भ में सबसे बेहतर स्थिति लक्षद्वीप में 4% है | जम्मू और कश्मीर और लद्दाख में ऐसी महिलाओं की संख्या 6% है | हिमाचल, गोवा और नागालैंड में यह दर लगभग 7% है |

रिपोर्ट की मानें तो कम उम्र में शादी करने का चलन कम हुआ है | 20 से 24 साल के आयुवर्ग में 23% महिलाएं ऐसी हैं जिनकी शादी कानूनी उम्र से पहले कर दी गई | लेकिन 45-49 के आयु वर्ग में यह दर 47% है | 

और 45-49 उम्र वाले पुरुषों में 27% की शादी 21 साल से पहले हुई और 25 से 29 आयु वाले में 18% पुरुषों की शादी हुई | 

रिपोर्ट के अनुसार स्कूल जाने वाली महिलाओं की शादी में देरी देखी गई है | 25 से 49 साल की उम्र वाली स्कूल न जाने वाली महिलाओं में शादी की औसत उम्र 17.1 साल है, जबकि 12 साल या उससे ज्यादा समय तक शिक्षा हासिल करने वाली महिलाओं में यह उम्र 22.8 दर्ज की गई |

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महिला हिंसा पर क्या कहते हैं आंकडे

एनएफएचएस-5 के अनुसार 18-49 आयु वर्ग की 32% महिलाओं ने अपने वैवाहिक जीवन में अपने साथी से शारीरिक, यौन और भावनात्मक हिंसा का सामना किया है | हिंसा के प्रकार में 28% महिलाओं ने शारीरिक हिंसा का सामना किया है | 

शारीरिक हिंसा में महिलाओं ने मोच, आंख में चोट, हड्डी टूटना, जलना, दांत टूटना और गहरे घाव का सामना किया है | केवल 14% महिलाओं ने माना है कि शारीरिक हिंसा के दौरान किसी अन्य ने बचाव किया है |      

महिलाओं के प्रति हिंसा की प्रवृत्ति भारतीय समाज में लगातार बनी हुई है | रिपोर्ट के अनुसार 18 से 49 आयु वर्ग वाली 30% महिलाओं का मानना है कि उन्होंने 15 वर्ष की उम्र से किसी न किसी तरह की हिंसा का सामना किया है | 

6% का मानना है कि उन्होंने जीवन में एक बार शारीरिक हिंसा का सामना ज़रूर किया है | इसी आयुवर्ग की तीन प्रतिशत महिलाओं ने अपनी प्रेगनेंसी के दौरान शारीरिक हिंसा होने की बात भी स्वीकारी है |

साथ ही रिपोर्ट में 82% महिलाओं ने अपने पति को यौन संबंध बनाने से मना करने में सक्षम होना बताया है | 

वहीं पति-पत्नी के बीच यौन संबंध बनाने की सहमति को लेकर पुरुषों के एक वर्ग का कहना है कि पुरुष को सहमति लेने की आवश्यकता ही नहीं है | 

पत्नी के यौन संबंध बनाने से मना करने को लेकर पुरुषों से चार तरीके के व्यवहार के अधिकार के तौर पर फटकारना, पैसे देने से मना करना, जोर-जबरदस्ती करना और किसी अन्य महिला के साथ संबंध को लेकर विकल्प दिए गए |

ऐसी सोच को देखकर तो लगता है इन रूढ़ियों की नजर में महिला केवल एक चीज है | क्यों भई महिलाओं में सांस प्राण नहीं है क्या? और क्यों नही महिलाएं यौन संबंध बनाने से मना कर सकती? शादी की है तो पुरूषों का उन पर इतना अधिकार कि महिलाएं उनके आधीन हो गई |

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प्रजनन दर 2.2 से घटकर 2.0 हुई

एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट बताती है कि भारत की कुल प्रजनन 2.2 से घटकर 2.0 हो गई है | 

तो क्या हम यह कह सकते हैं कि देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए उठाए गए कदम सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं | 

एनएफएचएस के चौथे चरण के आंकड़ों के अनुसार प्रजनन दर 2.7 था | 

आपको बता दें कि प्रति महिला बच्चों की औसत संख्या के रूप में कुल प्रजनन दर निकाला जाता है | 

रिपोर्ट में आंकड़ों के अनुसार, देश में केवल 5 ऐसे राज्य हैं, जहां की प्रजनन क्षमता 2.1 से अधिक है, इनमें बिहार (2.98), मेघालय (2.91), उत्तर प्रदेश (2.35), झारखंड (2.26) और मणिपुर (2.17) शामिल हैं |

एनएफएचएस-5 का कार्य देश के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों के 707 जिलों (मार्च 2017 तक) के लगभग 6.37 लाख परिवारों में किया गया था | 

एनएफएचएस-5 में 7,24,115 महिलाओं और 1,01,839 पुरुषों को शामिल किया गया था, ताकि अलग-अलग अनुमान का पता चल सके |

रिपोर्ट में यह भी पता चलता है कि देश में कन्ट्रासेप्टिव प्रिवलेंस रेट (सीपीआर) यानी गर्भनिरोधक प्रसार दर में भी अच्छी वृद्धि हुई है | यह 54% से बढ़कर 67% हो गया है | 

आसान शब्दों में कहें तो देश की महिला अब अपने जीवन में 2 बच्चों को ही जन्म दे रही हैं |

कुल प्रजनन दर उन बच्चों की औसत संख्या है जिन्हें एक महिला अपने जीवनकाल में जन्म देती है |

विकसित देशों में, प्रतिस्थापन स्तर की प्रजनन क्षमता को प्रति महिला औसतन 2.1 बच्चों की आवश्यकता के रूप में लिया जा सकता है |

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प्रजनन स्वास्थ्य की स्थिति

एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट के अनुसार देश में साल 2019-21 के दौरान 15 से 49 साल की 11% महिलाओं ने जीवन में एक बार स्टिलबर्थ और अबॉर्शन का अनुभव किया है | 2015-16 में यह दर 12% थी | 

रिपोर्ट यह भी कहती है कि अबॉर्शन कराने वाली लगभग आधी महिलाओं, लगभग 48% ने यह फैसला अनियोजित गर्भावस्था की वजह से लिया था | 16% महिलाओं को अपने अबॉर्शन के दौरान जटिलताओं का सामना भी करना पड़ा |

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पहली बार महिलाओं का अनुपात पुरुषों से अधिक

एनएफएचएस शुरू होने के बाद पहली बार महिलाओं का अनुपात पुरुषों से अधिक था | 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाएं हैं | 

2015-16 में प्रति 1,000 पुरुषों पर 991 महिलाएं थीं | हालांकि, पिछले पांच वर्षों में जन्म लेने वाले बच्चों के लिए जन्म के समय लिंग अनुपात 2015-16 में 919 प्रति 1,000 पुरुषों से बढ़कर 929 प्रति 1,000 हो गया था | 

यह रिपोर्ट इस बात को बताती है कि लड़कियों की तुलना में लड़कों के जीवित रहने की संभावना औसतन बेहतर बनी हुई है | उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में यह बदलाव समय के साथ बदलते परिवेश का एक सकारात्मक उदाहरण है |

कुल आबादी में लिंग अनुपात शहरों की बजाए गाँव में बेहतर है | गाँव में प्रति 1000 पुरुषों पर 1037 महिलाएं हैं, जबकि शहरों में 985 महिलाएं हैं |

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बच्चों और महिलाओं में एनीमिया की स्थिति चिंतित करने वाली

बच्चों के पोषण अवस्था में थोड़ा सुधार जरूर देखा गया है, लेकिन बच्चों और महिलाओं में एनीमिया (खून की कमी) की स्थिति चिंतित करने वाली है |

एनीमिया से ग्रस्त महिलाएँ 53.1% से बढ़कर 57%, पुरुष 22.7% से बढ़कर 25% व बच्चे 58.6% से बढ़कर 67.1% हो गए हैं |

ग्रामीण भारत में 6 महीने से 5 साल के 68.3% बच्चों में खून की कमी दर्ज की गई है | शहरों में ये दर 64.2% है | 

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शिशु मृत्यु दर में आई कमी

एनएफएचएस के चौथे चरण की तुलना में 2019-21 की इस रिपोर्ट के अनुसार, देश की शिशु मृत्यु दर में कमी देखने को मिली है | देश में प्रति 1,000 जन्मों पर मृत्यु दर यानी नवजात शिशुओं और पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है |

एनएफएचएस-5 के आंकड़ों में कुपोषण के तीन संकेतकों बौनापन (उम्र के हिसाब से कम ऊँचाई), चाइल्ड वेस्टिंग (ऊँचाई के हिसाब से कम वजन) और कम वजन (उम्र के हिसाब से कम वजन) में भी सुधार देखा गया है |

इस सर्वेक्षण के अनुसार, स्टंटिंग यानी बौनापन 38% से घटकर 36%, वेस्टिंग 21% से घटकर 19% और कम वजन 36% से घटकर 32% हो गया है | हालाँकि अधिक वजन वाले बच्चों की हिस्सेदारी 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 3.4 प्रतिशत हो गई है |

2019-21 में शहरी क्षेत्रों में 30% की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में 37% बच्चों में स्टंटिंग अधिक है | स्टंटिंग के मामले में पुडुचेरी में सबसे कम 20% और मेघालय में सबसे अधिक 47% है |

हरियाणा, उत्तराखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और सिक्किम में 7%, झारखंड, मध्य प्रदेश और मणिपुर में 6%, और चंडीगढ़ और बिहार में 5% स्टंटिंग में उल्लेखनीय कमी देखी गई |

6 माह से कम उम्र के बच्चों को स्तनपान कराने के संबंध में भी विशेष सुधार हुआ है | यह 2015-16 में 55% था, जो वर्ष 2019-21 में बढ़कर 64% हो गया है |

12-23 माह की आयु वर्ग के बच्चों के पूर्ण टीकाकरण में 62% से 76% तक सुधार हुआ है | 14 में से 11 राज्यों व संघ राज्यक्षेत्रों में 12-23 माह के ऐसे बच्चों की संख्या 75% से अधिक है, जिनका पूर्ण टीकाकरण हो चुका है | इन बच्चों की संख्या ओडिशा में सर्वाधिक लगभग 90% है |

अस्पतालों में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या 79% से बढ़कर 89% हो गई है | पुदुचेरी और तमिलनाडु में 100% संस्थागत प्रसव होता है | 

दूसरे चरण के 7 राज्यों व संघ राज्यक्षेत्रों में यह 90% से अधिक है |

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मोटापे से ग्रस्त है महिलाएं

एनएफएचएस-5 में अधिकतर राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में अधिक वजन या मोटापे की समस्या बढ़ी है | 

राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं में 21% से बढ़कर 24% और पुरुषों में 19% से बढ़कर 23% हो गई है | 

केरल, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, आंध्र प्रदेश, गोवा, सिक्किम, मणिपुर, दिल्ली, तमिलनाडु, पुडुचेरी, पंजाब, चंडीगढ़ और लक्षद्वीप 34% से 46% में एक तिहाई से अधिक महिलाएं ज्यादा वजन या मोटापे से ग्रस्त हैं |

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बैंक में बढ़े महिलाओं के खाते

एनएफएचएस-4 की अपेक्षा एनएफएचएस-5 में महिलाओं के बैंक खातों में उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है | 

अब बैंक खाताधारक महिलाएं 53% से बढ़कर 79% हो गई हैं |

यह लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है |  

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