kiran mazumdar shaw

देश की पहली स्वनिर्मित अरबपति महिला की बात करें तो किरण मजूमदार शाॅ का नाम सबसे पहले आता है |

स्कॉटलैंड में रॉयल सोसाइटी ऑफ एडिनबर्ग (RSE) दुनिया के सबसे पुराने और सबसे सम्मानित अकादमिक में से एक है | 

विज्ञान, कला, शिक्षा, व्यवसाय और सार्वजनिक जीवन के क्षेत्रों से आरएसई में शामिल होने के लिए अध्येताओं को चुना जाता है ताकि उनके आसपास की दुनिया को बेहतर बनाने में उनके प्रभाव को मान्यता दी जा सके |

बायोकॉन प्रमुख किरण मजूमदार-शॉ इस साल 2022 में आरएसई की फैलोशिप में नियुक्त होने वाले 80 दिग्गजों में शामिल हैं |

वह लगभग 1,700 फेलो की आरएसई की वर्तमान फेलोशिप में जुडी़, जिन्हें स्कॉटलैंड में या उसके साथ काम करने वाले कुछ महान शोधकर्ताओं और चिकित्सकों के रूप में पहचाना जाता है |

फोर्ब्स सूची में भारत की पांचवी सबसे अमीर महिला घोषित किरण मजूमदार शाॅ ने अपने दम पर यह मंजिल तय की है |

किरण मजूमदार-शॉ एक भारतीय महिला उद्यमी, टेक्नोक्रेट, अन्वेषक और बैंगलोर स्थित बायोकॉन की संस्थापक है | बायोकॉन एक अग्रणी जैव प्रौद्योगिकी संस्थान है | 

वे बायोकॉन लिमिटेड की अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक तथा सिनजीन इंटरनेशनल लिमिटेड और क्लिनिजीन इंटरनेशनल लिमिटेड की अध्यक्ष हैं |

बायोकॉन एंजाइमों का विनिर्माण करने वाली भारत की पहली कंपनी थी, जो अमेरिका और यूरोप को दवा निर्यात करती थी | 1989 में बायोकॉन लिमिटेड भारत की पहली जैव प्रौद्योगिकी कंपनी बनी | 

कंपनी एक के बाद एक कई रिकॉर्ड तोड़ते हुए साल 2003 तक मानव इंसुनिल विकसित करने वाली दुनिया की पहली कंपनी बन गई |

आज यह कंपनी 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की कंपनी बन चुकी है |

किरण मजूमदार-शॉ जैव प्रौद्योगिकी में अपने अग्रणी कार्यों और महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित पद्मश्री (1989) और पद्म भूषण (2005) समेत कई पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी हैं |

2014 में, उन्हें विज्ञान और रसायन विज्ञान की प्रगति में उत्कृष्ट योगदान के लिए ओथम गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया था |

जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए उत्कृष्ट कार्यों को कॉर्पोरेट दुनिया में बहुत ही सम्मान दिया गया है | साथ ही भारतीय उद्योग और बायोकॉन दोनों को विश्व स्तर पर मान्यता मिली है |

टाईम पत्रिका के दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची उनका नाम भी शामिल किया गया था | 

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वे दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की फोर्ब्स की सूचीबद्ध थीं | 

2015 में, उन्हें फोर्ब्स द्वारा दुनिया की 85 वीं सबसे शक्तिशाली महिला के रूप में सूचीबद्ध किया गया था | 2016 में, वह “फोर्ब्स” में एक ओर बार दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिला के रुप में 77वें स्थान पर सूचीबद्ध थीं |

किरण मजूमदार-शॉ फाइनेंशियल टाईम्स के बिजनेस में शीर्ष 50 महिलाओं की सूची में भी शामिल थीं |

वे ईवाई वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर ऑफ द ईयर 2020 पुरस्कार से सम्मानित की गईं |

किरण मजूमदार-शॉ मानती है कि “उद्देश्य कसौटियों और चुनौतियों का सामना करने की भावना के साथ सपने का पीछा करना ही सफलता है | सफलता को प्राप्त करने का कोई आसान रास्ता नहीं है और न ही केवल मेहनत कोई विकल्प है | अलग तरीके से काम करना भी सफलता का एक मंत्र है, मजबूती से खड़े होने के लिए कुछ अलग करने की हिम्मत होनी चाहिए |”

आइये जानें किरण मजूमदार शॉ के इस शानदार और प्रेरक जीवन के सफर के बारे में…

प्रारंभिक जीवन

भारत की जानी मानी उद्योगपति किरण मजूमदार शॉ का जन्म 23 मार्च 1953 को कर्नाटक के बेंगलुरु में गुजराती परिवार में हुआ था |

उनके पिता का नाम रसेंद्र मजूमदार है, जो यूनाइटेड ब्रुअरीज में हेड ब्रूमास्टर थे | उनकी माँ का नाम यामिनी मजूमदार है |

उन्होंने बेंगलुरु के ही बिशप कॉटन गर्ल्स हाई स्कूल से अपनी शिक्षा पूरी की | साल 1973 में बेंगलुरु विश्वविद्यालय से बीएससी (जूलॉजी ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त की | 

उनके पिता ने सुझाव दिया कि वह किण्वन विज्ञान का अध्ययन करें और ब्रूमास्टर बनने के लिए प्रशिक्षण लें, जो महिलाओं के लिए एक बहुत ही गैर-पारंपरिक क्षेत्र है |

फिर उन्होंने वैलेरेट कॉलेज, मेलबर्न यूनिवर्सिटी ऑस्ट्रेलिया से ‘मॉल्टिंग और ब्रूइंग’ विषय पर उच्च शिक्षा अर्जित की | वहाँ इस विषय पर शिक्षा ग्रहण करने वाली वे अकेली लड़की थीं |

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व्यक्तिगत जीवन

साल 1998 में किरण मजूमदार शॉ ने 45 साल की उम्र में स्कॉटलैंड के मूल निवासी जॉन शॉ से शादी की | 

उनके पति 1991-1998 तक मदुरा कोट्स के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक रहे | वर्तमान में जॉन शॉ ‘बायोकॉन लिमिटेड’ के उपाध्यक्ष हैं |

किरण मजूमदार-शॉ कला प्रेमी है और उनके पास चित्रों और कला से संबंधित चीजों का एक बहुत विशाल संग्रह है | 

उन्होंने लेखिका के रूप में एक कॉफी टेबल पुस्तक, एले एंड आर्टि, द स्टोरी ऑफ बीयर लिखी हैं |

वे नागरिक कार्यकर्ता के रूप में, बंगलौर शहर के विकास के लिए बंगलौर एजेंडा टास्क फोर्स (BATF) जैसे विभिन्न कार्यक्रमों से जुड़ी हुई हैं |

करियर

पढ़ाई के साथ-साथ किरण मजूमदार शाॅ ने मेलबर्न के ही कार्लटोन और यूनाइटेड ब्रुअरीज, ब्रुअर, बैरेट ब्रदर्स और बर्स्टोन में बतौर प्रशिक्षु के रूप में काम किया | 

फिर कुछ समय बाद वे कोलकाता के जूपिटर ब्रुअरीज लिमिटेड में तकनीकी सलाहकार के तौर पर कार्यरत रहीं | 

साल 1975-1977 तक उन्होंने बड़ौदा के स्टैंडर्ड मोल्डिंग कॉरपोरेशन में तकनीकी प्रबंधक पद पर कार्य किया |

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बायोकॉन के सफर की शुरूआत

ब्रूमास्टर की डिग्री प्राप्त करने के बाद, जब उन्होंने बैंगलोर या दिल्ली में अपने करियर को आगे बढ़ाने की संभावना की जांच की, तो उन्हें बताया गया कि उन्हें भारत में मास्टर ब्रेवर के रूप में काम नहीं मिल सकता क्योंकि यह पुरूषों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में से एक है | 

फिर उन्होंने अवसरों की तलाश विदेश में की और उन्हें स्कॉटलैंड में एक पद की पेशकश की गई |

स्कॉटलैंड में किरण मजूमदार-शॉ, कॉर्क आयरलैंड के बायोकॉन बायोकेमिकल्स लिमिटेड की फ़ाउंडर, लेस्ली औचिनक्लोस से मिली | 

औचिनक्लोस की कंपनी ने ब्रूविंग बनाने, खाद्य-पैकेजिंग और कपड़ा उद्योगों में उपयोग किए जाने वाले एंजाइम का उत्पादन करते थे | 

वह भारत में एक भागीदार की तलाश कर रहे थे ताकि उन्हें पापेन की आपूर्ति करने के लिए एक भारतीय सहायक कंपनी स्थापित करने में मदद मिल सके |

उनका आइडिया किरण मजूमदार शॉ को पसंद आया | उन्होंने कुछ दिनों की ट्रेनिंग ली और फिर वापस भारत आ गई |

उन्होंने 1978 में बेंगलुरु में अपने किराए के घर के गैरेज में अपने पास उपलब्ध संसाधनों और बैंक में पड़े 10,000 रूपए की मदद से बायोकॉन इंडिया की शुरुआत की |

यह एक संयुक्त उद्यम था, कानूनन कंपनी का 30%  विदेशी स्वामित्व था और कंपनी का 70% हिस्सा किरण मजूमदार शॉ का था |

चुनौतियों का किया सामना

यह वह दौर था, जब स्टार्ट-अप का बहुत ज्यादा चलन नहीं था | खासकर महिलाओं के लिए बिजनेस शुरू करना काफी मुश्किल था | 

किरण मजूमदार शॉ को बायोकॉन को शुरू करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा | ना कोई बैंक उन्हें पैसे देने के लिए तैयार था और ना ही कोई उनके साथ काम करना चाहता था | 

लेकिन दृढ़ता और आत्मविश्वास से भरी किरण मजूमदार शॉ ने हार नहीं मानी |

उन्हें अपनी इस यात्रा में अपने माता-पिता का भी पूरा साथ मिला | शुरुआत में किरण मजूमदार शॉ को जरूर मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी योग्यता के बल पर इनका अच्छे से सामना किया |

प्रारंभ में उन्हें अपनी कम उम्र, लिंग और बिना परखे गए व्यापार मॉडल के कारण विश्वसनीयता संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा | उन्होंने सभी चुनौतियों का सामना किया और सीमित परिस्थिति में बायोकॉन को नई दिशा और प्रगति की ऊँचाइयों पर ले गयीं |

एक सामाजिक कार्यक्रम में उन्हें एक बैंकर से मिलने का मौका मिला और फिर वे अपनी पहली वित्तीय सहायता प्राप्त करने में सक्षम हुईं |

अपने स्टार्ट-अप के लिए लोगों को जोड़ना भी उनके लिए किसी चुनौती से कम नही था | उनका पहला कर्मचारी एक सेवानिवृत्त गैरेज मैकेनिक था और उसकी पहली इकाई 3,000-वर्ग फुट के शेड में थी | 

उस समय उनकी प्रयोगशाला में सबसे जटिल उपकरण एक स्पेक्ट्रोफोटोमीटर था | इसके अतिरिक्त, उन्हें खराब बुनियादी ढांचे वाले देश में बायोटेक व्यवसाय बनाने की कोशिश से जुड़ी तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा | 

उस दौरान भारत में निर्बाध बिजली, अच्छी गुणवत्ता वाला पानी, स्टेराइल लैब, आयातित अनुसंधान उपकरण और उन्नत वैज्ञानिक कौशल वाले विशेषज्ञ सरलता से नहीं मिलते थे | 

कंपनी की प्रारंभिक परियोजनाएं पापेन और इसिंगग्लास की निष्कर्षण थीं | अपनी स्थापना के एक साल के भीतर ही, बायोकॉन को इंडिया एंजाइमों का निर्माण करने में सफलता प्राप्त हुई | अपने पहले साल के अंत में, मजूमदार ने अपनी कमाई का इस्तेमाल 20 एकड़ की संपत्ति खरीदने के लिए किया, जिसे भविष्य में विस्तार करने की योजना थी |

बायोकॉन की स्थापना के एक वर्ष के अन्दर ही कंपनी एंजाइमों का विनिर्माण करने वाली और संयुक्त राज्य अमेरिका तथा यूरोप को उनका निर्यात करने वाली भारत की पहली कंपनी बन गई | 

साल 1989 में बायोकॉन भारत की पहली जैव-प्रौद्योगिकी कंपनी बनी, जिसे ट्रेडमार्क युक्त प्रौद्योगिकियों के लिए अमेरिका से धन प्राप्त हुआ | 

साल 1990 में उन्होंने बायोकॉन के उन्नत आन्तरिक अनुसंधान कार्यक्रम को ट्रेडमार्क युक्त सान्द्र अधःस्तर खमीरण प्रौद्योगिकी पर आधारित बनाया | 

साल 1997 में उन्होंने मानव स्वास्थ्य के क्षेत्र में पहल की |

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सहायक कंपनियों की स्थापना

किरण मजूमदार शॉ ने बायोकॉन के विकास को एक औद्योगिक एंजाइम निर्माण कंपनी से पूरी तरह से एकीकृत बायो-फार्मास्युटिकल कंपनी के रूप में उत्पादों के एक संतुलित व्यापार पोर्टफोलियो और मधुमेह, ऑन्कोलॉजी और ऑटो-इम्यून रोगों पर एक शोध फोकस के साथ आगे बढ़ाया | 

उन्होंने दो सहायक कंपनियों की भी स्थापना की, सिनजीन (1994) जो अनुबंध के आधार पर प्रारंभिक अनुसंधान और विकास सहायता सेवाएं प्रदान करती है और क्लिनिजीन (2000) जो नैदानिक ​​अनुसंधान परीक्षणों और जेनेरिक और नई दवाओं दोनों के विकास पर केंद्रित है | 

क्लिनिजीन को बाद में सिनजीन में मिला दिया गया | सिनजीन को 2015 में बीएसई/एनएसई में सूचीबद्ध किया गया था, और इसका बाजार पूंजीकरण ₹23,000 करोड़ है |

1984 में, किरण मजूमदार शॉ ने बायोकॉन में एक अनुसंधान और विकास टीम विकसित करना शुरू किया, जो नए एंजाइमों की खोज और ठोस सब्सट्रेट किण्वन तकनीक के लिए नई तकनीकों के विकास पर ध्यान केंद्रित कर रही थी | 

कंपनी का पहला बड़ा विस्तार 1987 में हुआ, जब आईसीआईसीआई वेंचर्स के नारायणन वाघुल ने 250,000 अमेरिकी डॉलर उद्यम पूंजी कोष के निर्माण का समर्थन किया | 

इस सहायता से बायोकॉन के अपने अनुसंधान और विकास प्रयासों का विस्तार करने में गतिशीलता आई | उन्होंने जापानी तकनीकों से प्रेरित अर्ध-स्वचालित ट्रे कल्चर प्रक्रिया के आधार पर मालिकाना ठोस सब्सट्रेट किण्वन तकनीक की विशेषता वाला एक नया संयंत्र बनाया | 

1989 में, बायोकॉन प्रौद्योगिकियों के लिए यू.एस. फंडिंग प्राप्त करने वाली पहली भारतीय बायोटेक कंपनी बन गई |

1990 में, किरण मजूमदार शॉ ने क्यूबन सेंटर ऑफ मॉलिक्यूलर इम्यूनोलॉजी के साथ एक संयुक्त उद्यम में बायोथेराप्यूटिक्स की एक चुनिंदा श्रृंखला के निर्माण और विपणन के लिए बायोकॉन बायोफार्मास्युटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड (बीबीएलपी) को शामिल किया |

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बायोकॉन जब बनी स्वतंत्र कंपनी

आयरलैंड के बायोकॉन बायोकेमिकल्स कंपनी को 1989 में यूनिलीवर द्वारा लेस्ली औचिनक्लोस से अधिग्रहित किया गया था | 

यूनिलीवर के साथ साझेदारी ने बायोकॉन को वैश्विक सर्वोत्तम व्यवसाय और गुणवत्ता प्रणालियों को स्थापित करने में मदद मिली | 1997 में, यूनिलीवर ने बायोकॉन सहित अपने विशेष रसायन विभाग को इंपीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज (ICI) को बेच दिया | 

1998 में, किरण मजूमदार शॉ के पति, स्कॉट्समैन जॉन शॉ ने व्यक्तिगत रूप से ICI से बकाया बायोकॉन शेयर खरीदने के लिए $ 2 मिलियन जुटाए | 

स्वतंत्र संस्था बनने के दो साल बाद इसका ट्रेडमार्क युक्त सान्द्र मैट्रिक्स खमीरण पर आधारित बायो-रिएक्टर बना, जिसका नामकरण ‘प्लैफरेक्टर टीएम’ (Plafractor TM) किया गया था | 

किरण मजूमदार-शॉ ने कंपनी को विशेष दवाइयों के उत्पादन के लिए पहला पूरी तरह से स्वचालित जलमग्न खमीरण संयंत्र बनाया | 

साल 2003 तक ‘बायोकॉन लिमिटेड’ मानव इंसुनिल विकसित करने वाली दुनिया की पहली कंपनी बन गई |

जॉन शॉ ने बायोकॉन में शामिल होने के लिए मदुरा कोट्स के अध्यक्ष के रूप में अपना पद छोड़ दिया | वह 2001 में बायोकॉन के वाइस चेयरमैन बने |

आईपीओ जारी करने वाली भारत की पहली बायोटेक्नोलॉजी कंपनी 

2004 में, नारायण मूर्ति की सलाह के बाद, किरण मजूमदार ने बायोकॉन को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने का फैसला किया |

उनका इरादा बायोकॉन के अनुसंधान कार्यक्रमों को और विकसित करने के लिए पूंजी जुटाना था | 

बायोकॉन आईपीओ जारी करने वाली भारत की पहली बायोटेक्नोलॉजी कंपनी थी | बायोकॉन के आईपीओ को 33 गुना बार सब्सक्राइब किया गया और इसके कारोबार का पहला दिन 1.11 अरब डॉलर के बाजार मूल्य के साथ बंद हुआ |

बायोकॉन आईपीओ की सूची के पहले दिन 1 अरब डॉलर का आंकड़ा पार करने वाली दूसरी भारतीय कंपनी बन गई |

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अन्य क्षेत्रों में भूमिकाएं

किरण मजूमदार-शॉ भारत सरकार की एक स्वायत्त निकाय इंडियन फार्माकोपिया कमीशन के प्रबंध निकाय और सामान्य निकाय की सदस्य हैं | 

वे स्टेम सेल बायोलॉजी एंड रिजेनरेटिव मेडिसीन के लिए बने संस्थान की सोसाइटी की संस्थापक सदस्य हैं | 

उन्हें वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा व्यापार मंडल और विदेश व्यापार महानिदेशालय की सदस्य के रूप में नामित किया गया है |

वे भारत सरकार के नेशनल इनोवेशन काउंसिल की एक सदस्य हैं | साथ ही बंगलौर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के प्रशासक मंडल की सदस्य हैं | 

किरण मजूमदार-शॉ विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान परिषद (SERC), भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य के लिए बायो वेंचर्स की बोर्ड सदस्य हैं |

वे कर्नाटक में आयरिश दूतावास की मानद वाणिज्य दूत हैं |

परोपकारी कार्य

साल 2004 में किरण मजूमदार-शॉ ने समाज के गरीब और कमजोर वर्गों को लाभ पहुंचाने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और पर्यावरण कार्यक्रम संचालित करने के लिए ‘बायोकॉन फाउंडेशन’ आरंभ किया | 

फाउंडेशन के ‘सूक्ष्म-स्वास्थ्य बीमा’ कार्यक्रम के अंतर्गत 70,000 ग्रामीण सदस्यों का नामांकन किया गया है |

साल 2009 में उन्होंने डॉ. देवी शेट्टी के. नारायण हृदयालय के साथ मिलकर बंगलौर के बूम्मसंद्रा के नारायण हेल्थ सिटी परिसर में 1,400 बिस्तरों वाले कैंसर देखभाल केंद्र की स्थापना की है | यह मजूमदार-शॉ कैंसर सेंटर (MSCC) के नाम से जाना जाता है |

नारायण हृदयालय अस्पताल की देवी शेट्टी के साथ, किरण मजूमदार-शॉ ने आरोग्य रक्षा योजना के विकास का समर्थन किया है | 

इस कार्यक्रम के माध्यम से बायोकॉन फाउंडेशन उन लोगों के लिए नैदानिक ​​देखभाल, जेनेरिक दवाएं और बुनियादी परीक्षण प्रदान करने के लिए क्लीनिक स्थापित करता है जो उन्हें वहन नहीं कर सकते | 

2010 तक, सात क्लीनिकों में से प्रत्येक ने 10 कि.मी. की दूरी में रहने वाले 50,000 रोगियों की आबादी की सेवा की, प्रति वर्ष कुल 3,00,000 से अधिक लोगों का इलाज किया | 

क्लिनिक नेटवर्क अस्पतालों से डॉक्टरों को लाकर दूरदराज के गांवों में नियमित सामान्य स्वास्थ्य जांच का आयोजन करते हैं | 

कैंसर का जल्द पता लगा सुधार करने के लिए, उन्होंने युवा महिलाओं को सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के रूप में प्रशिक्षित किया है, जो कि कैंसर केंद्र में ऑन्कोलॉजिस्ट को संदिग्ध घावों की तस्वीरें भेजने के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करती हैं | 

सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान जैसे “क्वीन ऑफ़ हार्ट” लोगों को विशिष्ट स्वास्थ्य संबंधित विषयों पर शिक्षित करते हैं और हृदय रोगों जैसी समस्याओं का शीघ्र पता लगाने को बढ़ावा देते हैं |

2011 में, उन्होंने एक अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण इकाई और एक शोध केंद्र के साथ उन्नत चिकित्सा विज्ञान के लिए एक केंद्र के रूप में जोड़ा | उनका लक्ष्य एक विश्व स्तरीय कैंसर केंद्र बनाना है | 

2015 में, वह द गिविंग प्लेज में शामिल हुईं, यह वादा करते हुए कि उनकी कम से कम आधी संपत्ति परोपकार के लिए समर्पित होगी |

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दवा व्यसाय क्षेत्र में योगदान

इंग्लैंड की मशहूर पत्रिका ‘द मेडिसिन मेकर’ ने दवा क्षेत्र की 100 हस्तियों की सूची में किरण मजूमदार-शॉ को दूसरे स्थान पर रखा है | खास बात यह है कि पत्रिका ने भारत से सिर्फ किरण मजूमदार शॉ को इस सूची में जगह दी है |

किरण मजूमदार-शॉ दवा बनाने वाली दुनिया की दूसरी सबसे शक्तिशाली हस्ती हैं, जो नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शस डिजीज, के डायरेक्टर एंथनी फॉची अमेरिका, के बाद दूसरे स्थान पर हैं |

किरण मजूमदार-शॉ का “मितव्यय नवापरिवर्तन” में हमेशा विश्वास रहा जो बायोकॉन के विस्तार के पीछे एक प्रेरक शास्त्र रहा है | कम-धनी देशों में सस्ती दवाओं की आवश्यकता से प्रेरित होकर, उन्होंने लागत प्रभावी तकनीकों और कम लागत वाले विकल्पों को विकसित करने के अवसरों की तलाश की | 

उन्होंने यह भी प्रस्ताव दिया है कि दवा कंपनियां विकासशील देशों के लिए विपणन में लागत-संवेदनशील हों, ताकि लोग अपनी ज़रूरत की दवाओं, विशेष रूप से पुरानी चिकित्सा का खर्च उठा सकें |

उन्होंने शुरुआत में ही स्टैटिन (कोलेस्ट्रॉल से लड़ने वाली दवाओं) के लिए बाजार की संभावनाओं पर ध्यान दिया | जब 2001 में कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा लवस्टैटिन का पेटेंट समाप्त हो गया, तो बायोकॉन इसके विकास में शामिल हो गया | फिर कंपनी ने स्टैटिन के अन्य रूपों में विस्तार किया | 

उनकी रणनीति का एक हिस्सा लंबी अवधि के आपूर्ति अनुबंधों में प्रवेश करना था, समय के साथ एक भरोसेमंद बाजार स्थापित करना | स्टैटिन का कंपनी के राजस्व में 50 प्रतिशत से अधिक का योगदान था | 

कंपनी का रिवेन्यू 1998 में ₹70 करोड़ से बढ़कर 2004 में ₹500 करोड़ हो गया जब यह सार्वजनिक हुआ |

बायोकॉन का क्षेत्रों में विस्तार जारी है | यीस्ट एक्सप्रेशन प्लेटफॉर्म विभिन्न प्रकार के ड्रग उपचारों में उपयोग के लिए कोशिकाओं के आनुवंशिक हेरफेर के लिए स्तनधारी सेल संस्कृतियों के लिए एक वांछनीय विकल्प प्रदान करते हैं | 

पिचिया पेस्टोरिस जैसे यूनिकेल्युलर मिथाइलोट्रोफिक यीस्ट का उपयोग टीकों, एंटीबॉडी खंडो, हार्मोन, साइटोकिन्स, मैट्रिक्स प्रोटीन और बायोसिमिलर के उत्पादन में किया जाता है | 

बायोकॉन के अनुसंधान के प्रमुख क्षेत्रों में अब कैंसर, मधुमेह, और अन्य ऑटो-प्रतिरक्षा रोग जैसे रुमेटीइड गठिया और सोरायसिस शामिल है | 

भारत में पान या तंबाकू चबाने वाले लोगों के उच्च प्रतिशत के कारण, भारत में दुनिया में मुंह के कैंसर का अस्सी प्रतिशत हिस्सा है, जिसे स्थानीय रूप से “मुँह के कैंसर” के रूप में जाना जाता है | 

बायोकॉन एक त्वचा वर्णक रोग सोरायसिस के इलाज के लिए दवाओं पर भी काम कर रहा है |

कंपनी द्वारा विकसित जैव-फार्मास्युटिकल्स में मधुमेह के लिए पिचिया-व्युत्पन्न पुनः संयोजक मानव इंसुलिन और इंसुलिन एनालॉग्स, सिर और गर्दन के कैंसर के लिए एक एंटी-ईजीएफआर मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और सोरायसिस के लिए एक बायोलॉजिक शामिल हैं | 

बायोकॉन एशिया का सबसे बड़ा इंसुलिन उत्पादक है, और इसमें सबसे बड़ी द्रवनिवेशन-आधारित एंटीबॉडी उत्पादन सुविधाएं हैं | 

2014 तक, बायोकॉन ने अपने रिवेन्यू का लगभग 10% अनुसंधान और विकास में निर्देशित किया, जो कि अधिकांश भारतीय फार्माकोलॉजिकल कंपनियों की तुलना में बहुत अधिक अनुपात है | 

किरण मजूमदार-शॉ जैव-प्रौद्योगिकी को एक क्षेत्र के रूप में बढ़ावा देने में रुचि रखती हैं | वे भारत सरकार के जैव-प्रौद्योगिकी विभाग के सलाहकार परिषद् की सदस्य भी हैं |

पुरस्कार और सम्मान

  • साइंस और केमिस्ट्री में खास योगदान के लिए किरण मजूमदार-शॉ को फिलाडेल्फिया (अमेरिका) में ‘ओथमेर स्वर्ण पदक-2014′ प्रदान किया गया था | वे विश्व की तीसरी और पहली भारतीय महिला हैं जिन्हें ‘ओथमेर स्वर्ण पदक’ मिला हैं | 
  • फोर्ब्स पत्रिका ने इन्हें वर्ष 2014 में दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में 92वें स्थान पर रखा था |
  • वर्ष 2007-08 में अमेरिका के एक प्रमुख व्यापार प्रकाशन ‘मेड एड न्यूज’ ने बायोकॉन को दुनिया भर की जैव-प्रौद्योगिकी कंपनियों में 20वां और दुनिया के सबसे बड़े नियोक्ताओं में 7वां स्थान दिया था |
  • अपने अग्रणी कार्यों के लिए इन्हें भारत सरकार के प्रतिष्ठित पद्मश्री (1989) और पद्म भूषण (2005) पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है | 
  • ‘टाइम पत्रिका’ के दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में उनका नाम भी शामिल किया गया है | 
  • वे दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की फोर्ब्स की सूची में शामिल हैं | 
  • वे फाइनेंशियल टाइम्स के कारोबार में शीर्ष 50 महिलाओं की सूची में भी शामिल हैं |
  • साल 2004 में जैव-प्रौद्योगिकी में इनके योगदानों के लिए इनकी मातृ संस्थान बैलेरैट यूनिवर्सिटी ने उन्हें विज्ञान का मानद डॉक्टरेट उपाधि प्रदान की |
  • उन्हें यूके के डंडी यूनिवर्सिटी ने साल 2007, यूके की ग्लासगो यूनिवर्सिटी ने साल 2008 और यूके के एडिनबर्ग की हेरिएट-वाट यूनिवर्सिटी ने भी साल 2008 में उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया |

कैसी लगी आपको किरण मजूमदार-शॉ के चुनौती पूर्ण और नवपरिवर्तनशील प्रौद्योगिकी की कहानी? हमें कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं |

Jagdisgha का अपने क्षेत्र में कौशल व जैव-प्रौद्योगिकी को ऊँचाईयों तक पहुँचाने वाली किरण मजूमदार-शॉ का सहृदय धन्यवाद |

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