द्वितीय विश्व युद्ध के कारण आगे चलकर उन्‍होंने गहनों और कपड़ों की डिजानिंग में सफल करियर बनाया | वह एक सफल महिला उद्यमी, चित्रकार और कपड़ों व आभूषणों की डिजाइनर बनीं |

1936 में एक महिला व 4 साल की बेटी की माँ सूती साड़ी पहनकर हवाई पट्टी पहुंची, सर पर एक हेलमेट लगाए हुए उसने एयरक्राफ्ट के कॉ​कपिट में बैठी, अपना चश्मा पहना और कुछ ही पलों में वो हवा में विमान को उड़ा ले गईं | यह जहाज़ जब ज़मीन पर वापस उतरा तो उस महिला का नाम इतिहास के पन्नों में अंकित हो चुका था | 

यह ऐतिहासिक नाम है सरला ठकराल का जिन्होंने जिप्सी मॉथ नाम का दो सीटर विमान उड़ाया था | ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने भारतीय संस्कृति का मान रखते हुए साड़ी पहनकर अपनी पहली सोलो फ्लाइट के लिए एक छोटे दो पंखों वाले विमान की उड़ान भरी |

ऐसा करने वाली भी वह भारत की पहली महिला थी |

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हमारे समाज ने हमेशा ही महिलाओं को कमतर समझा जाता रहा है, इसलिए उन्हें अपनी पहचान और आर्थिक स्वतंत्रता के लिए जटिल संघर्ष से गुजरना पड़ता है | ऐसा नही है कि केवल पुरूषों ने ही उनके पैरों में जंजीरे बांधी है, बल्कि ज्योतिराव फुले और राजा राम मोहन राय जैसे पुरूषों ने महिलाओं के उत्थान के लिए कार्य भी किए है |

सरला ठकराल को पंख देने वाले भी उनके पति और ससुर थे | पायलट ट्रेनिंग के लिए उनका दाखिला उनके ससुर ने जोधपुर फ्लाइंग क्‍लब में करवाया था | इस फ्लाइंग क्‍लब में उनसे पहले कोई लड़की कभी नहीं आई थी | 

आइये जानते है देश की पहली महिला पायलट के बारे मे

जन्म और शादी

सरला ठकराल का जन्‍म 8 अगस्‍त 1914 को दिल्ली के एक समृद्ध परिवार में हुआ था |

1929 में जब विमान उड़ाने के क्षेत्र में पुरुषों का वर्चस्व स्थापित था, उस समय साल 1929 में दिल्ली में खोले गए फ़्लाइंग क्लब में उन्होंने विमान चालन का प्रशिक्षण लिया | 

प्रशिक्षण के दौरान ही सरला ठकराल पी.डी. शर्मा से मिली | पी.डी. शर्मा एक व्यावसायिक विमान चालक थे |

उनकी शादी 16 साल की उम्र में पायलट पी. डी. शर्मा के साथ हो गई थी | उन्हें परिवार में सभी प्यार से मति कह कर बुलाते थे |

ससुराल में मिला सहयोग

शादी के बाद उनके पति पी.डी. शर्मा ने सरला ठकराल को व्यावसायिक विमान चालक बनने के लिए प्रोत्साहित किया | 

उनके ससुराल में परिवार के 9 सदस्य पायलट थे | शादी के बाद पी. डी. शर्मा ने उनमें उड़ान भरने और विमानों में उनकी जिज्ञासा को पहचाना | उनकी उत्सुकता का सम्मान करते हुए उन्‍होंने, उन्हें एक पायलट बनने की सलाह दी |

उनके पति पी. डी. शर्मा भारतीय एयर मेल पायलट का लाइसेंस प्राप्त करने वाले पहले पायलट थे | वो कराची से लाहौर के बीच की उड़ान भरते थे |

पायलट ट्रेनिंग के लिए सरला ठकराल का उनके ससुर ने जोधपुर फ्लाइंग क्‍लब में प्रवेश करवाया | उनसे पहले इस फ्लाइंग क्‍लब ने कभी कोई लड़की नहीं देखी थी | लेकिन ये क्या वहां एक महिला साड़ी पहनकर विमान चलाना सीखने आई थी |  

उनकी अपने उद्देश्य के प्रति गहन रूची के कारण हर सवालों के जवाब उनके मुख पर रहते |

उन्होंने जोधपुर फ्लाइंग क्लब में अपनी ट्रेनिंग पूरी की | जब उनके आवश्यक उड़ान के घंटे पूरे हो गए, तब उनके प्रशिक्षक (Trainer) चाहते थे कि वह सोलो उड़ान भरें | ट्रेनिंग के दौरान, पहली बार, उन्होंने साल 1936 में लाहौर में, जिप्सी मॉथ नाम का दो सीटर विमान उड़ाया था | उनके साथ के किसी भी सदस्य को इस बात से आपत्ति नहीं थी, केवल फ्लाइंग क्लब के एक क्लर्क को छोड़कर |

उस दौरान उन्होंने भारतीय संस्कृति का मान रखते हुए साड़ी पहनकर अपनी पहली सोलो फ्लाइट में उड़ान भरी | और अपना फ्लाइंग टेस्ट पास किया |

जब उन्होंने अपनी पहली उड़ान भरी, उस वक्त वह न केवल शादीशुदा थी, बल्कि एक 4 साल की बेटी की मां भी थीं |

एक रिपोर्ट के अनुसार उस उड़ान के बाद उन्होंने कहा था, “जब मैंने पहली बार प्लेन उड़ाया, तब ना केवल मेरे पति, बल्कि मेरे ससुर भी खुश और उत्साहित थे | उन्होंने मुझे फ्लाइंग क्लब में दाखिला दिलाया | मुझे पता था कि मैं पुरुषों के इस कार्य में, महिला होने के बावजूद डटी हुई हूं | लेकिन मैं उन पुरुषों की प्रशंसा करती हूं, जिन्होंने मेरा समर्थन किया और हौसला बढ़ाया |”

जब भरी 1000 घंटे की उड़ान 

फ्लाइंग टेस्ट पास करने के बाद सरला ठकराल अब पायलट बनने के लिए तैयार हो चुकी थीं | उन्हें अपना पहला ‘ए लाइसेंस’ प्राप्त करने के लिए लगभग 1000 घंटे तक विमान उड़ाने का अनुभव करना था | यह कारनामा करने वाली सरला ठकराल उस समय केवल 21 साल की ही थीं | 

वह 1000 घंटे की उड़ान पूरा कर ‘ए लाइसेंस’ प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला भी थीं | 

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क्यों बदल गया दिया जीवन का उद्देश्य

1939 में पहला लाइसेंस मिलने के बाद सरला ठकराल ने कमर्शियल पायलट का लाइसेंस लेने की ठान ली | पर किसे पता था कि वह ऐसा नही कर पाएंगी | उनके जीवन का तो एक नया दौर आरंभ होने वाला था |

उन्हें आपने इस समय में दोहरी मार झेलनी पडी़ | पहले तो जब उन्हें कमर्शियल पायलट का लाइसेंस पाने के लिए जोधपुर में टेस्ट देना ही था, कि उससे पहले ही उन्हें खबर मिली की एक विमान हादसे में उनके पति की मृत्यु हो गयी है | 

यह क्षति उनके लिए बहुत बड़ी थी मगर वह उनके पति की इच्छा का मान रखते हुए पायलट बनने के दोनों के सपने को छोड़ना नही चाहती थी | इसलिए दो बेटीयों की माँ ने हिम्मत जुटाई और जोधपुर वापस लौटकर अपनी ट्रेनिंग आरंभ की | 

लेकिन उसी वक्त विश्वयुद्ध शुरू हो जाने के कारण सभी उड़ानें निलंबित हो रही थीं | और उस समय यह भी नहीं पता था कि यह दौर कितना लंबा चलेगा |

इह तरह 1939 में जब सरला ठकराल कमर्शियल पायलट लाइसेंस के लिए मेहनत कर रही थी, तभी दूसरे विश्व युद्ध के कारण ट्रेनिंग बीच में ही छूट गई |

अब वह इस बीच क्या करती क्योंकि विमान चालक के रूप में करियर बनाना तो अभी असंभव सा ही था | वह जोधपुर से लाहौर लौट आईं |

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कैसे आत्मनिर्भर बन बनी उद्यमी

विकट परिस्थितियों में भी सरला ठकराल ने हिम्मत नही हारी | उन्होंने लाहौर के मेयो स्कूल ऑफ आर्ट्स (अब नेशनल कॉलेज ऑफ आर्ट्स) से फाइन आर्ट्स और चित्रकला की शिक्षा ली | 

फाइन आर्ट्स और चित्रकला का अध्ययन करने के बाद उन्होंने पेंटिंग और डिजाइनिंग से अपने नए करियर की शुरुआत की |

अजीब ही है परिस्थितियों का खेल जिसने एक ऐसा पुल निर्मित किया जो भूत और वर्तमान में बिल्कुल ही भिन्न था |

सरला ठकराल केवल चित्रकारी तक ही सीमित न थी, वह हैंडीक्राफ्ट, कैलिग्राफी और कॉस्ट्यूम व ज्वेलरी डिज़ाइन का काम भी लगातार करती रही | 

महिलाओं के बीच उनके बनाए डिज़ाइन काफी प्रसिद्ध हुए | दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो चुका था और उनका बिजनेस भी सही चल रहा था |

लेकिन 1947 में जब भारत पाकिस्तान का विभाजन हुआ तो सरला ठकराल अपनी दोनों बेटियों के साथ दिल्ली आकर रहने लगीं | 

सरला आर्य समाज से जुड़ी हुईं थी, इसलिए विधवा विवाह भी कोई समस्या नहीं थी | भारत के विभाजन के बाद लाहौर से दिल्ली आने पर उनकी भेट आर.पी. ठकराल से हुई |

1948 में एक साल बाद उन्होंने आर.पी. ठकराल के साथ शादी कर ली | उन्होंने अपने जीवन की नई शुरुआत करते हुए कपड़े और गहने डिजाइन करने की दिशा में कदम रखा और लगभग 20 साल तक कुटीर उद्योगों से जुड़ी रहीं | 

विजय लक्ष्मी पंडित जैसी महिलाओं को उनके बनाए डिजाइन काफी पसंद आए |

देश की होनहार महिला पायलट ने एक उद्यमी की भूमिका बखूबी निभायी |

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उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें अपने आप ही अपने काम करने की आदत है और इसी में विश्वास भी रखती हैं |

वह आगे कहती है कि जब मैं स्कूल में थी, तब मेरा मोटो था हमेशा खुश रहना | मनुष्य के तौर पर सब जानवरों से अलग हमें कुदरत का वरदान हंसी के तौर पर मिला है इसलिए खुश और हंसते रहना बहुत ज़रूरी है | मेरे जीवन में जो भी संकट आए, इस मोटो ने मुझे हमेशा हौसला दिया |

जीवन के संकट तो आपने देखे ही, एक किस्सा और बताते है | अपनी उड़ान के दिनों में साड़ी पहनने वाली सरला जब कॉकपिट में बैठती थीं तो सिर पर घूंघट के काम आने वाली चुन्नी उतारकर सहयोगी को दे देती थीं | इस पर अमेरिका में भारतीय राजदूत बनने वाले राय बहादुर रूपचंद ने एक बार उनके पति को धमकाकर कहा था कि ‘सरला को इस बेशर्मी’ से रोका जाए |

इस किस्से को याद करके हंसने वाली सरला ठकराल ने यह भी बताया ​था कि सिर्फ 30 रुपये घंटे के हिसाब से उन्हें उड़ान की ट्रेनिंग दी जाती थी | सस्ती कीमत की वजह यही थी कि उस समय जान का जोखिम होने के चलते ज़्यादा लोग इस पेशे में नहीं आते थे |

15 मार्च 2008 में इस आत्मनिर्भर महिला ने अपनी आखरी सांसे ली |

सरला ठकराल की उपलब्धि, साहस और संघर्ष की कहानी हर महिला के लिए प्रेरणा से कम नही | 

परिस्थितियों से हार कर उन्होंने कभी अपने जीवन को मजबूरी के अंधेरों की ओर नही धकेला |

यही तो जीवन का सार भी है, हर मनुष्य को अब चाहे वो स्त्री हो या पुरूष उन्हें विकट स्थिति में भी अपनी हिम्मत और आत्मविश्वास को कमजोर नही होने देना चाहिए |

कैसी लगी आपको सरला ठकराल की प्रेरणा से भरी जीवन यात्रा? हमे कमेंट बॉक्स में बताना न भूलें |

Jagdisha का संघर्षशील महिला को कोटी-कोटी नमन |

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