madam bhikaji cama

21 अगस्त, 1907 को जर्मनी के एक शहर स्टटगार्ट में एक अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन आयोजित किया जा रहा था | सम्मेलन में भाग लेने के लिए दुनिया भर से एक हजार प्रतिनिधि आए थे | इसी अवसर पर भीकाजी कामा ने भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का पहला संस्करण फहराया- हरे, केसरिया और लाल धारियों वाला तिरंगा | 

उत्साह से भरी भीकाजी कामा ने आयोजन में अपने तिरंगे को ले लोगों को संबोधित करते हुए घोषणा की, “यह स्वतंत्र भारत का झंडा है | मैं सभी सज्जनों से अपील करती हूँ कि वे खड़े होकर ध्वज को सलामी दें |”

आपको जान कर थोड़ा अचंभा हो सकता है कि 1907 में तो भारत देश ब्रिटिश सरकार के अधीन था यानी एक ऐसा समय जब हमारा देश स्वतंत्र भी नही हुआ था उस घटना से चकित होकर सम्मेलन में उपस्थित सभी प्रतिनिधि उठ खड़े हुए और भारत के पहले झंडे को सलामी दी | 

भीकाजी कामा देश में ब्रिटिश राज होने के कारण गरीबी, भुखमरी और उत्पीड़न को सामने लाना चाहती थीं, साथ ही भारत की स्वतंत्रता की तीव्र चाह को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के ध्यान में लाना चाहती थी और वह इसमें सफल भी रहीं |

यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी | अभी भारत की आज़ादी 40 साल दूर थी, और दुनिया अभी भी उन हज़ारों युवा भारतीयों के हृदय में प्रज्वलित देशभक्ति से अनजान थी जो अपने देश को औपनिवेशिक शासन से मुक्त करने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार थे | इसके अलावा, उस समय, अंग्रेज क्रांतिकारियों पर प्रतिबंध और आजीवन कारावास देकर दंडित करने की पूरी कोशिश कर रहे थे | भीकाजी कामा की क्रांतिकारी हरकतें और शब्द ब्रिटिश राज के लिए राजद्रोह थे और अगर उन्होंने उन्हें पकड़ लिया होता, तब तो अंडमान की खतरनाक काला पानी जेल ही भेजते |

चलिये जानते हैं इस अदम्य महिला की कहानी…

भीकाजी कामा का जन्म 24 सितंबर 1861 को बॉम्बे (अब मुंबई ) में एक बड़े संपन्न पारसी परिवार में हुआ था | उन्हें मैडम कामा के नाम से भी जाना जाता है | उनके पिता सोराबजी फ्रामजी पटेल और उनकी माँ जयजीबाई सोराबजी पटेल पारसी समुदाय में काफी प्रभावशाली थे | उनके पिता मुंबई शहर के एक प्रसिद्ध व्यापारी थे | वे प्रशिक्षण से वकील और परोपकार में सबसे आगे थे |

उस समय की कई पारसी लड़कियों की तरह, भीकाजी कामा ने एलेक्जेंड्रा गर्ल्स इंग्लिश इंस्टीट्यूशन में पढ़ाई की | वे एक मेहनती और अनुशासित बच्ची थी और प्रतिभा की काफी धनी थी |

एक ऐसे माहौल से प्रभावित होकर जिसमें भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन जड़ जमा रहा था, भीकाजी कामा बहुत कम उम्र से ही राजनीतिक मुद्दों की ओर आकर्षित हो गईं थी | भाषाओं के प्रति उनका रुझान था, इस कारण उन्हें बहुत सी भाषाओं का ज्ञान था | 

1885 में, उनकी शादी एक प्रसिद्ध वकील रुस्तमजी कामा के साथ हुई | लेकिन सामाजिक-राजनीतिक विषयों में उनके विपरीत विचार होने के कारण दंपति के बीच मतभेद पैदा हो गए | 

रुस्तमजी कामा ब्रिटिशों के वकील थे, उनकी संस्कृति उन्हें पसंद थी | वे सोचते थे कि उन्होंने भारत के लिए बहुत अच्छा किया है, और भारत का विकास कर रहे है | वही दूसरी ओर भीकाजी कामा के दिल में राष्ट्रवादी भाव थे और वे मानती थी कि अंग्रेजों ने अपने लाभ के लिए भारत का बेरहमी से शोषण किया | जिस कारण उनका वैवाहिक जीवन सुखी नहीं था, और भीखाजी ने अपना अधिकांश समय और ऊर्जा परोपकारी गतिविधियों और सामाजिक कार्यों में बिताई |

1896 में, बॉम्बे प्रेसीडेंसी में बुबोनिक प्लेग फैल गया और भीकाजी ने तुरंत स्वेच्छा से प्लेग पीड़ितों को बचाने के लिए काम कर रही टीम की मदद की | 

मुंबई में सैकड़ों लोग मर रहे थे और भीकाजी भी इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आ गई थी | हालांकि वह ठीक हो गई, लेकिन इस बीमारी के बाद उनकी शारीरिक शक्ति क्षीण हो गई थी और वह दिन-प्रतिदिन कमजोर होती जा रहीं थी |  

उन्हें आराम और स्वास्थ्य लाभ के लिए यूरोप जाने की सलाह दी गई और 1902 में, भीकाजी कामा भारत से लंदन चली गईं | लेकिन उसके बाद उन्हें बाकी का लगभग पूरा जीवन वही बिताना पड़ा |

थोड़ा अजीब है कि एक देशभक्त भला अपने देश से दूर कैसे रह सकता है | लेकिन इसी देश प्रेम की भावना के कारण उन्हें अपना जीवन वहां बिताना पड़ा और वहां उन्होंने वो किया जो भारत में रह कर भी वो नही कर पाईं थी |

क्यो नही लोट पाईं स्वदेश

1904 में भीकाजी कामा ने भारत लौटने के लिए याचिका दी |

लंदन में, भीकाजी कामा दादाभाई वह श्यामजी कृष्ण वर्मा के संपर्क में आईं, जो लंदन के भारतीय समुदाय में हाइड पार्क में दिए गए उग्र राष्ट्रवादी भाषणों के लिए जाने जाते थे | उनके माध्यम से, वे दादाभाई नौरोजी से मिलीं, जो भारत में ब्रिटिश आर्थिक नीति के एक मजबूत आलोचक थे, और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश समिति के तत्कालीन अध्यक्ष थे | फिर भीकाजी कामा ने दादाभाई नौरोजी की निजी सचिव के रूप में काम किया |

दादाभाई नौरोजी और सिंह रेवाभाई राणा के साथ, भीकाजी कामा ने फरवरी 1905 में वर्मा की इंडियन होम रूल सोसाइटी की स्थापना का समर्थन किया |

लंदन में रहने के दौरान, उन्हें अंग्रेजों से एक संदेश मिला कि जब तक वह राष्ट्रवादी गतिविधियों में भाग न लेने का वादा करते हुए एक बयान पर हस्ताक्षर नही करेंगी, तब तक उनकी भारत वापसी पर रोक लगा दी जाएगी | उन्होंने ऐसा वादा या कोई भी हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया और यही कारण था की वह स्वदेश न लौट पाईं |

कैसे पहुंचती उनकी साप्ताहिक पत्रिकाएं भारत तक 

1905 में भीकाजी कामा पेरिस में स्थानांतरित हो गई, जहां एस.आर. राणा और मुंचेरशाह बुर्जोरजी गोदरेज के साथ-साथ उन्होंने पेरिस इंडियन सोसाइटी की सह-स्थापना की | 

निर्वासन में रह रहे भारतीय संप्रभुता के आंदोलन के अन्य उल्लेखनीय सदस्यों के साथ, भीकाजी कामा ने आंदोलन के लिए क्रांतिकारी साहित्य लिखा, प्रकाशित और वितरित किया, जिसमें बंदे मातरम (वंदे मातरम कविता पर पूर्णतः प्रतिबंध के जवाब में स्थापित) शामिल था। ) और बाद में मदन की तलवार (मदन लाल ढींगरा की फांसी के जवाब में) शामिल थे | 

पांडिचेरी के फ्रांसीसी उपनिवेश के माध्यम से इन साप्ताहिक पत्रिकाओं को भारत में भेजा जाता था |

भारत और ब्रिटेन में प्रतिबंधित, भीकाजी भारतीय क्रांतिकारियों को साप्ताहिक पत्रिकाएँ भेजने में कामयाब रही | उन्होंने क्रांतिकारियों की हर संभव मदद की, चाहे वह धन, सामग्री या विचारों से हो | तमाम कोशिशों के बाद भी ब्रिटिश सरकार उन्हें कैसे भी रोक नहीं पाई |

जर्मनी में फहराया भारत का झंडा

22 अगस्त, 1907 को, मैडम भीकाजी कामा जर्मनी के स्टटगार्ट में विदेशी धरती पर भारतीय ध्वज फहराने वाली पहली भारतीय बनीं | ब्रिटेन से मानवाधिकार, समानता और स्वायत्तता की अपील करते हुए, उन्होंने भारतीय में आए अकाल के विनाशकारी प्रभावों का वर्णन किया |

उन्होंने जो झंडा फहराया था, वह कामा और श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा सह-डिजाइन किया गया था, और बाद में यह उस खाके में से एक है, जिससे भारत का वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज बनाया गया था | 

इस ध्वज में, शीर्ष हरी पट्टी में आठ खिलते हुए कमल थे जो पूर्व स्वतंत्र भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते थे | केंद्रीय भगवा पट्टी पर हिंदी में ‘वंदे मातरम’ लिखा गया था | नीचे की लाल पट्टी पर दायीं ओर आधा चाँद और बायीं ओर उगता हुआ सूरज था, जो हिंदू और मुस्लिम आस्था को दर्शाता |

उसी ध्वज को बाद में समाजवादी नेता इंदुलाल याज्ञनिक द्वारा भारत में लाया गया और अब वह झंडा पुणे में मराठा और केसरी पुस्तकालय में प्रदर्शित किया गया है |

महिलाओं के अधिकार के लिये भी किए कार्य

स्टटगार्ट के बाद, भीकाजी कामा संयुक्त राज्य अमेरिका गईं, जहां उन्होंने बहुत यात्रा की, अमेरिकियों को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के बारे में बताया | 

उन्होंने महिलाओं के लिए भी लड़ाई लड़ी और अक्सर राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका पर जोर दिया | 

1910 में मिस्र के काइरो में राष्ट्रीय सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान पूछा, “मिस्र का आधा भाग कहाँ है? मैं केवल पुरुषों को ही देख रही हूँ जो आधे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं! माताएँ कहाँ हैं? बहनें कहाँ हैं? आपकी पत्नियाँ और बेटियाँ कहाँ हैं?”

महिलाओं के वोट के अधिकार का भीकाजी कामा समर्थन करती थी |  

हेराबाई और मिथन टाटा, दो पारसी महिलाएं वोट के अधिकार के मुद्दे पर मुखर होकर, कहती | 

1920 में, हेराबाई और मिथन टाटा से मिलने पर भीकाजी कामा ने कहा: “भारतीयों की स्वतंत्रता के लिए काम करो | जब भारत स्वतंत्र होगा तो महिलाओं को न केवल वोट देने का अधिकार होगा, बल्कि अन्य सभी अधिकार होंगे |”

1914 विश्व युद्ध के दौरान उन्हें क्यों जाना पड़ा जेल

1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा तो भीकाजी कामा ने ब्रिटिश विरोधी रुख अपनाया | उन्होंने मार्सिले में सेना के शिविर का दौरा किया और वहां भारतीय सेना से पूछा, “क्या आप उन लोगों के लिए लड़ने जा रहे हैं जिन्होंने आपकी मातृभूमि को जकड़ रखा है?”

प्रथम विश्व युद्ध के फैलने के साथ, फ्रांस और ब्रिटेन सहयोगी बन गए | भीकाजी कामा और सिंह रेवाभाई राणा को छोड़कर पेरिस इंडिया सोसाइटी के सभी सदस्य पेरिस छोड़ गए | उन्हें एक साथी-समाजवादी जीन लॉन्गेट ने एम. पी. तिरूमल आचार्य के साथ स्पेन जाने की सलाह दी थी | लेकिन उन्होंने मना कर दिया |

अक्टूबर 1914 में उन्हें और राणा को कुछ समय के लिए गिरफ्तार किया गया था, जब उन्होंने पंजाब रेजिमेंट के सैनिकों के बीच आंदोलन करने की कोशिश की थी, जो मोर्चे के रास्ते में मार्सिले पहुंचे थे | 

उन्हें मार्सिले छोड़ने की आवश्यकता थी, और भीकाजी कामा फिर बोर्डो के पास, आर्काचोन में राणा की पत्नी के घर चली गईं | 

जनवरी 1915 में, फ्रांसीसी सरकार ने राणा और उनके पूरे परिवार को कैरेबियाई द्वीप मार्टीनिक भेज दिया | 

भीकाजी कामा को विची भेज दिया गया, जहाँ उन्हें नजरबंद कर दिया गया | खराब स्वास्थ्य होने के कारण, उन्हें नवंबर 1917 में रिहा कर दिया गया और बोर्डो लौटने की अनुमति दी गई, बशर्ते कि वह स्थानीय पुलिस को साप्ताहिक रिपोर्ट करे | 

युद्ध के बाद, भीकाजी कामा पेरिस में रुए डे पोन्थियू में अपने घर लौट आईं | अदम्य महिला ने भारतीय, आयरिश और मिस्र के क्रांतिकारियों के साथ-साथ फ्रांसीसी समाजवादियों और रूसी नेतृत्व के साथ सक्रिय संपर्क बनाए रखा |

कैसे लौटी स्वदेश

भीकाजी कामा 1935 तक यूरोप में निर्वासन में रहीं | उस वर्ष की शुरुआत में उन्हें लगे आघात से लकवा मार गया और वे गंभीर रूप से बीमार हो गईं | तब उन्होंने ब्रिटिश सरकार से अपने देश लौटने की अनुमति देने के लिए याचिका दायर की | लेकिन फिर से उनके सामने वही शर्त रखी गई |

वे जानती थी कि उनके पास अब ज्यादा समय बचा नही है और वह अपनी अंतिम सांसे अपनी मिट्टी में लेना चाहती थी | और इस बार उन्होंने शर्त मान ली |

24 जून 1935 को पेरिस में एक लिखित बयान में, उन्होंने यह स्वीकार किया कि वह क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग नही लेगीं |

यह जानते हुए कि वह स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने की स्थिति में नहीं थी, उन्हें 33 वर्षों के लंबे समय के बाद भारत लौटने की अनुमति दी गई थी |

जहांगीर के साथ, वह नवंबर 1935 में बॉम्बे पहुंची और नौ महीने बाद 74 वर्ष की आयु में 13 अगस्त 1936 को पारसी जनरल अस्पताल में भीकाजी कामा ने अंतिम सांसे ली |

देश ने एक कुशल अधिवक्ता, बहुभाषी और साहसी नेता खो दिया था |

उन्होंने अपनी अधिकांश निजी संपत्ति लड़कियों के लिए अवाबाई पेटिट अनाथालय को दे दी थी | 

26 जनवरी 1962 को, भारत के 11वें गणतंत्र दिवस पर, भारतीय डाक और तार विभाग ने उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया | 

1997 में, भारतीय तटरक्षक बल ने आईसीजीएस भीकाजी कामा नामक एक प्रियदर्शिनी-श्रेणी के तेज गश्ती पोत को भी चालू किया |

भीकाजी कामा को श्रद्धांजलि स्वरूप दक्षिण दिल्ली के पॉश स्थान में उच्च वृद्धि कार्यालय परिसर, जिसमें प्रमुख सरकारी कार्यालय और कंपनियां जैसे ईपीएफओ, जिंदल समूह, एसएआईएल, जीएआईएल, ईआईएल आदि शामिल हैं, को भीकाजी कामा प्लेस नाम दिया गया है |

देखिए, स्वतंत्र भारत का झंडा! इसे उन युवा भारतीयों के खून से पवित्र बनाया गया है, जिन्होंने इसके सम्मान में अपने प्राणों की आहुति दे दी | इस झंडे के नाम पर मैं दुनिया भर के स्वतंत्रता प्रेमियों से इस संघर्ष का समर्थन करने की अपील करती हूँ | — भीकाजी कामा

इस महान महिला को कभी भूला नही जाना चाहिए | कैसी लगी आपको भीकाजी कामा के साहस और भारतीय दिलो में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित करने वाली कहानी | हमे कमेंट बॉक्स में बताना न भूले |

Jagdisha का महान स्वतंत्रता सेनानी को शत् शत् नमन |

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