first woman pilot of india usha sundaram

आज देश के विमानन उद्योग में, भारतीय महिला पायलटों की संख्या 15 प्रतिशत है, जबकि वैश्विक औसत केवल 5 प्रतिशत ही है | लेकिन उस समय, कॉकपिट में एक महिला का होना एक असाधारण बात थी |

1947 में ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता और भारत के विभाजन के बाद, यह अनुमान लगाया गया है कि लोगों की कुल हानि लगभग 20 मिलियन थी | जब पंजाब और बंगाल के प्रांतों में दुर्भाग्यपूर्ण सांप्रदायिक हिंसा की आग भड़क उठी, तो सीमा की दूसरी ओर फंसे लोगों को बचाने के प्रयास किए गए | 

लोगों को बचाने की कोशिश में शामिल लोगों में उषा सुंदरम नाम की एक बहादुर युवा महिला पायलट भी शामिल थी |

उषा सुंदरम स्वतंत्र भारत की सेवा करने वाली पहली महिला पायलटों में से थीं, लेकिन उनके साहसी कार्य काफी हद तक अज्ञात और अनसुने हैं | लगभग दो साल पहले, टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि कैसे बैंगलोर (अब बेंगलुरु) में रहने वाली इस महिला ने प्रतिकूल माहौल का सामना किया और निर्दोष लोगों की जान बचाने के लिए बचाव अभियान के तहत अपरिचित इलाके में उड़ान भरी |

हाल ही में रूस और यूक्रेन के मध्य युद्ध के दौरान भारतीय छात्रो को स्वदेश वापस लाने के लिए गंगा  ऑपरेशन चलाया गया, जिसमें महाश्वेता चक्रवर्ती नाम की एक महिला पायलट ने ऑपरेशन गंगा में हिस्सा लिया और यूक्रेन की सीमाओं से 800 भारतीयों को स्वदेश वापस लाईं | 

उस समय उषा सुंदरम ने भी कुछ ऐसा ही काम किया, लेकिन अधिक जोखिम भरी परिस्थितियों में क्योंकि उन्होंने पकिस्तान में हिंसा प्रभावित क्षेत्रों के बीचोंबीच अपनी उड़ान भरी थी | 

उषा सुंदरम के बड़े बेटे, सुरेश सुंदरम ने एक इंटरव्यू में बताया, “जुलाई 1941 में मेरे पिता से शादी करने के तुरंत बाद ही काफी छोटी उम्र में मेरी मां ने आसमान छू लिया था | मेरे पिता एक कुशल पायलट थे, जो मद्रास फ्लाइंग क्लब में ट्रेनर थे | उन दिनों, को-पायलट लाइसेंस मिलना बहुत मुश्किल काम नहीं था | इसलिए मेरे पिता अक्सर जब पूरे भारत या फिर मद्रास से सीलोन के लिए उड़ान भरते थे, तो मेरी माँ, उनके साथ को-पायलट की सीट पर रहती थीं |”

उषा सुंदरम के पति कैप्टन वी. सुंदरम 1935 में 19 साल की उम्र में पायलट बने | उन्होंने इंग्लैंड में प्रशिक्षण लिया और मद्रास फ्लाइंग क्लब में प्रशिक्षक बनने के लिए भारत लौट आए | उन्होंने देश भर में बड़े पैमाने पर उड़ान भरी, और माना जाता है कि विमान से ताजमहल की तस्वीर लेने वाले वे पहले व्यक्ति थे | द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने ब्रिटिश और अमेरिकी पायलटों को प्रशिक्षित भी किया था |

कैप्टन वी. सुंदरम देश में कमर्शियल पायलट लाइसेंस पाने वाले पहले पायलट थे | 26 अक्टूबर 1936 को, उन्होंने कराची से मद्रास के लिए एक डी हैविलैंड डव विमान उड़ाया | उनके पास 35 वर्षों के दौरान एक पायलट के रूप में कार्य करते हुए दुर्घटना मुक्त उड़ान का रिकॉर्ड था | उन्होंने एक पायलट के रूप में अपने अनुभवों को एन एयरमैनस् सागा नामक पुस्तक में लिखा |

1941 में उषा सुंदरम की शादी कैप्टन वी. सुंदरम के साथ हुई | उन्होंने शादी के बाद, विमान उड़ाने में रुचि दिखाई | 

अपने पति की मदद से और उनकी स्वाभाविक योग्यता और दृढ़ निश्चय से जल्दी ही वह विमान उड़ान का कौशल हासिल करने में सफल हुईं | और वह मद्रास (चेन्नई) से सीलोन (श्रीलंका) और वापस हवाई यात्रा पर अपने पति की सह-पायलट बन गई |

1940 के दशक के अंत में सरदार वल्लभभाई पटेल ने अंग्रेजों से आजादी के बाद भारत को एकजुट करने के अपने ऐतिहासिक प्रयास में देश भर की यात्रा की | सरदार वल्लभभाई पटेल को काफी आश्चर्य और गर्व हुआ क्योंकि की बंगलौर से 20 वर्षीय उषा सुंदरम अक्सर उनकी उड़ानों के लिए पायलटों में से एक थी |

Usha Sundaram with Sardar Vallabh Bhai Patel

काफी कम उम्र में ही उषा सुंदरम, राजनेताओं की अच्छी मित्र बन गई थीं |

साल 1946 में उषा सुंदरम और वी. सुंदरम बैंगलोर पहुंचे और गार्डन सिटी में सेंट मार्क्स रोड पर एक छोटे से बंगले में रहने लगे | एक योग्य पायलट होने के कारण वी. सुंदरम मैसूर रियासत के लिए नागरिक उड्डयन निदेशक के रूप में शामिल हुए | फिर कुछ वर्षों के बाद 1998 में, जक्कुर में गवर्नमेंट फ्लाइंग ट्रेनिंग स्कूल (GFTS) की स्थापना हुई और वी. सुंदरम को प्रिंसिपल नियुक्त किया गया | 

उषा सुंदरम ने खराब मौसम में भी कुशलता से उड़ानों की कमान संभाली और बचाव मिशन का नेतृत्व किया, जिसमें कम ऊंचाई पर यात्रा की आवश्यकता थी, क्योंकि उस समय केबिन दबाव अविश्वसनीय था | यहां तक ​​कि जब उनके पति ने एयरलाइन व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कुछ समय के लिए विमान चलाने से दूरी बनाई, तो उन्होंने अकेले चाचा नेहरू और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के विमान की भी कमान संभाली | उनकी इस कुशलता से देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद काफी प्रभावित हुए |

दोनों उषा सुंदरम और वी. सुंदरम को मैसूर के महाराजा के विमान डकोटा डीसी-3 के निजी पायलट के रूप में चुना गया था | उसी विमान का इस्तेमाल उस समय के अन्य वीआईपी (VIP) द्वारा भी किया जाता था |

वे दोनों कई प्रतिष्ठित लोगों के पायलट रहे, जिसमें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, मैसूर के महाराजा, भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम भी शामिल है |

1949 में उषा सुंदरम GFTS से उत्तीर्ण होने वाली पहली छात्रा थीं और पायलट लाइसेंस पाने वाली पहली महिला थीं | उषा सुंदरम भारत की पहली महिला पायलट बनीं |

उषा के सबसे छोटे बेटे चिन्नी कृष्णा ने एक इंटरव्यू में बताया, “नेहरू और पटेल जैसे स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले नेता, मेरे माता-पिता के साथ मैसूर महाराजा के निजी जेट पर उड़ान भरना पसंद करते थे, क्योंकि इस विमान की पूरी क्रू भारतीय थी | उस समय अन्य विमानों में मुख्य रूप से अमेरिकी और ब्रिटिश सदस्य हुआ करते थे।” इसके अलावा ये दोनों, राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आज़ाद के भी पायलट रहे |

कैसे बनाया रिकॉर्ड

कम दूरी की उड़ान भरने वाली ब्रिटिश हवाई-कंपनी, डी हैविलैंड डव को ब्रिटेन के सबसे सफल पोस्ट वॉर सिविल डिजाइनों में से एक माना जाता है | 

साल 1946 के आसपास, यह अपनी आधुनिकता, भार वहन क्षमता, सेफ इंजन फेल्यर परफॉर्मेंस और आसानी से इंटरचेंज और रीमूव होने वाले पार्ट्स के लिए जाना जाता था | उस समय यह विमान किसी चमत्कार से कम नहीं था | 

साल 1950 में, मद्रास सरकार ने राज्य के लिए डी हैविलैंड डव का एक मॉडल खरीदने के लिए उषा सुंदरम और वी सुंदरम से संपर्क किया |

उन्होंने भी सरकार के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया | वह दोनों एक शिप से इंग्लैंड गए और वहां से एक नया डी हैविलैंड डव खरीदा | 

अगले वर्ष, ये दंपति पेरिस, कराची और बगदाद के रास्ते लंदन से बॉम्बे पहुंचे | 27 घंटे में पिस्टन-इंजन डव पर इंग्लैंड से भारत की उड़ान के लिए विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया, जो आज तक कायम है |

1952 में, उषा सुंदरम ने अपने तीन बच्चों की देखभाल के लिए पेशेवर उड़ानों से सेवानिवृत्त हो गईं | वह और उनके पति जीवन के अंत तक शौकिया रूप से उड़ान भरते रहे |

कैप्टन वी. सुंदरम एक महान पशु प्रेमी भी थे | 1959 में  कैप्टन वी. सुंदरम, उनकी पत्नी उषा सुंदरम और उनके तीन बच्चों ने ब्लू क्रॉस ऑफ इंडिया की स्थापना की, जिसे उन्होंने अपने घर के भीतर जानवरों के लिए एक छोटे से बचाव गृह के रूप में शुरू किया | वहां से यह संगठन पूरे एशिया में सबसे प्रसिद्ध पशु कल्याण संस्थानों में से एक बन गया | संस्था को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं |

13 दिसंबर, 2001 को बेंगलुरू में नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज (एनएएल) में एक मीडिया बातचीत में, जहां उन्हें भारत की पहली महिला पायलट के रूप में सम्मानित किया गया था, उषा सुंदरम ने लंदन से 27 घंटे की उड़ान और 22 साल की उम्र में अपने पहले उड़ान अनुभव की यादे ताजा की | 

उन्होंने अपने साक्षात्कार में कहा, “उड्डयन के क्षेत्र में लैंगिक पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए क्योंकि विमान के साथ महिलाओं की क्षमता पुरुषों के बराबर है |”

एक लंबे और समर्पित जीवन के बाद, 31 मई 1997 में कैप्टन वी. सुंदरम का निधन हो गया | 

5 अप्रैल 2010 को 86 साल की उम्र में भारत की पहली महिला पायलट ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया |

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