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8 नवम्बर 2021 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में एक बुजुर्ग महिला कपड़ो के नाम पर पारम्परिक धोती पहने, गले में आदिवासी जीवनशैली से जुड़ी कुछ मालाएं और बिना चप्पल के नंगे पैर ही पहुँची थीं | उन्हें राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्‍मानित किया गया |

साधारण सी दिखने वाली वह महिला कभी स्कूल नही गईं | वह आदिवासी महिला कर्नाटक के हलक्की स्वदेशी जनजाति से आती हैं | उन्होंने अपनी माँ के साथ नर्सरी में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया |

आज वह जड़ी-बूटियों और पौधों की प्रजातियों के बारे में व्यापक जानकारी रखती हैं | इसलिए तुलसी गौड़ा को जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया कहा जाता है | 

 

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तुलसी गौड़ा किशोरी अवस्था से ही पर्यावरण की रक्षा में सक्रिय रूप से योगदान दे रही हैं | और लाखो पेड़ लगा चुकी हैं |

उन्हें जंगलों में किसी एक तरह के पेड़ के बीच उनकी उत्पत्ति के लिए आवश्यक मातृ पेड़ की पहचान करने में महारत हासिल है | साथ ही उन्हें बीजों की गुणवत्ता पहचानने का भी अच्छा अनुभव है | 

78 वर्षीय तुलसी गौड़ा गिनकर नहीं बता सकती कि पूरी जिंदगी में उन्होंने कितने पेड़ लगाए | 40 हजार का अंदाजा लगाने वाली वह करीब एक लाख से भी अधिक पेड़ लगा चुकी हैं | उन्होंने अपना पूरा जीवन पेड़-पौधों को समर्पित किया है |

उन्हें ‘इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र अवॉर्ड, ‘राज्योत्सव अवॉर्ड’ और ‘कविता मेमोरियल’ जैसे कई अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है | 

आज भी वो कई पौधों के बीज जमा करने के लिए खुद वन विभाग की नर्सरी तक जाती हैं और अगली पीढ़ी को भी यही संस्कार देना चाहती हैं | परिणाम स्वरूप तुलसी गौड़ा और अन्य सभी कई पौधों के बीजो को इकट्ठा करके, गर्मियों के मौसम तक उनका रखरखाव करते हैं | और फिर जंगल में उन बीजो को बो आते है |

इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक पर्यावरणविद् के रूप में उनकी कहानी कई वर्षों में कई लोगों के लिए प्रेरणा साबित हुई है और आगे भी बहुत से लोगों को उनकी जीवन यात्रा से प्रेरणा मिलेगी |

आइये जानते है, तुलसी गौड़ा के बारे में…

जन्म और प्रारंभिक जीवन

तुलसी गौड़ा का जन्म 1944 में, कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले, बस्ती होन्नल्ली गांव के हलक्की आदिवासी परिवार में हुआ था |

गरीब परिवार में जन्मी तुलसी गौड़ा ने 2 साल की उम्र में ही अपने पिता को खो दिया था | जिस कारण वह कभी अपनी औपचारिक शिक्षा की ओर तो मुख कर ही नही पाईं | छोटी सी उम्र ही वह अपनी माँ के साथ नर्सरी में जाने लगी थी, और वहाँ उनके साथ काम करती |

11 साल की उम्र में ही उनकी शादी गोविंद गौड़ा नाम के एक आदमी से करा दी गई थी | जब वह 50 साल की उम्र की थी, तब उनके पति का निधन हो गया था |

उन्होंने 20 साल की उम्र से अपनी माँ के साथ एक स्थानीय नर्सरी में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करना शुरू कर दिया था | 

 

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पेड़-पौधों से लगाव

अस्थाई रूप से नर्सरी से जुडी़ तुलसी गौड़ा कर्नाटक वानिकी विभाग में उगाये जाने वाले बीजों की देखभाल किया करती थी | और वह विशेष रूप से उन बीजों की देखभाल करती थीं जो कि अगासुर सीड बेड का हिस्सा होते थे | उन्होंने 35 साल तक अपनी माँ के साथ दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया |

प्रकृति संरक्षण के प्रति उनके समर्पण और लगाव को देखते हुए उन्हें वन विभाग में स्थायी पद के लिए पेशकश की गई  | तुलसी गौड़ा स्थायी पद पर 15 सालो तक काम करने के बाद 70 वर्ष की आयु में सेवानृवित्त हो गईं |

नर्सरी में अपने पूरे समय के दौरान, उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से प्राप्त भूमि के अपने पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करके वन विभाग द्वारा वनीकरण के प्रयासों का मुकाबला करने के लिए सीधे योगदान दिया और काम किया |

तुलसी गौड़ा ने न केवल अनगिनत पौधे लगाए हैं जो आगे उगेंगे भी, और कई बड़े होकर ऐसे पेड़ बन गए हैं जो दुनिया को बेहतर जीवन जीने में मदद करते हैं, उन्होंने शिकारियों को वन्यजीवों को नष्ट करने से रोकने में भी मदद की है | और कई जंगल की आग को रोकने के लिए भी काम किया है |

तुलसी गौड़ा भले ही कभी स्कूल नहीं गई, लेकिन उनका ज्ञान किसी पर्यावरण वैज्ञानिक से कम नहीं है |

वह हर तरह के पौधों के बारे में जानकारी रखती है, साथ ही किस पौधे के लिए कैसी मिट्टी अनुकूल है, किस पौधे को कितना पानी देना है आदि में भी उनका कोई मुकाबला नही |

वह जंगल में पेड़ की हर प्रजाति के मातृ वृक्ष की पहचान करने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है, चाहे उसका स्थान कोई भी हो |

मातृ पेड़ अपनी उम्र और आकार के कारण महत्वपूर्ण हैं, जो उन्हें जंगल में सबसे अधिक बुनियादी बनाते हैं | भूमिगत नोड का उपयोग मातृ पेड़ को नवीन पौधों और पौधों के अकुरण से जोड़ने के लिए किया जाता है क्योंकि वे नाइट्रोजन और पोषक तत्वों का आदान-प्रदान करते है |

तुलसी गौड़ा बीज संग्रह करने में भी माहिर हैं | बीज संग्रह पूरे पौधों की प्रजातियों को पुन: उत्पन्न करने और पुन: उत्पन्न करने के लिए मातृ वृक्षों से बीजों का निष्कर्षण है | यह एक बहुत ही कठिन प्रक्रिया है क्योंकि अंकुरों के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए मातृ पेड़ से बीजों को अंकुरण के चरम पर एकत्र किया जाना चाहिए, और वह इस सटीक समय को समझने में सक्षम हैं |

उन्होंने 300 से अधिक औषधीय पौधे लगाए है और उनकी पहचान की, जिनका उपयोग उनके गांव में बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है |  

तुलसी गौड़ा ने कर्नाटक वानिकी विभाग से सेवानिवृत्त के बाद अपना शेष जीवन अपने गांव के बच्चों को जंगल के महत्व के साथ-साथ बीजों को खोजने और उनकी देखभाल करने के तरीके के बारे में सिखाने के लिए समर्पित कर दिया है |

उन्होंने पर्यावरण के प्रति अपने प्यार को आज भी कम नहीं होने दिया और वह वनों के संरक्षण के लिए काम कर रही है | अब वह बच्चों को भी पेड़ों के महत्व के बारे में जागरूक करती है |

तुलसी गौड़ा का मानना है कि, ‘अगर जंगल बचेंगे, तो यह देश बचेगा | हमें जंगलों की जरूरत है | जंगलों के बिना सूखा होगा, फसल नहीं होगी, सूरज असहनीय रूप से गर्म हो जाएगा | जंगल बढ़ेगा तो देश भी बढ़ेगा | हमें ओर जंगल बनाने की आवश्यकता है |’

पर्यावरणवाद के अलावा, वह अपने गांव में महिलाओं के अधिकारों के लिए भी तत्पर रहती हैं | एक बार जब हलक्की समुदाय की ही एक महिला को एक विवाद के बाद बंदूक दिखाकर धमकाया गया, तब तुलसी गौड़ा उसकी सहायता के लिए आगे आई और कहा कि अगर अपराधी को दंडित नहीं किया गया तो वह जोरदार विरोध करेगीं |

पुरस्कार

तुलसी गौड़ा को कर्नाटक वानिकी विभाग में अपने व्यापक कार्यकाल के अलावा, बीज विकास और संरक्षण में अपने काम के लिए कई पुरस्कार और मान्यता प्राप्त है |

1986 में, उन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षामित्र पुरस्कार मिला, जिसे IPVM पुरस्कार के रूप में भी जाना जाता है | आईपीवीएम पुरस्कार वनीकरण और बंजर भूमि विकास के क्षेत्र में व्यक्तियों या संस्थानों द्वारा किए गए अग्रणी और परिवर्तनात्‍मक योगदान के लिए दिया जाता है |

1999 में, तुलसी गौड़ा को कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार से सम्मानित किया गया | यह “भारत के कर्नाटक राज्य का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान” है | कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार कर्नाटक राज्य के 60 से अधिक नागरिकों को वार्षिक रूप से दिया जाता है जो अपने संबंधित क्षेत्रों में प्रतिष्ठित होते हैं | 

26 जनवरी 2020 को, भारत सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया | 

तुलसी गौड़ा कहती है कि मुझे खुशी है कि मैंने कई पुरस्कार जीते हैं | इन सभी पुरस्कारों के बावजूद, पौधे मुझे सबसे ज्यादा खुशी देते हैं |

जनजातीय लोगों पर राष्ट्रीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार “जनजातीय क्षेत्र खनिजों से भरपूर हैं | ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड राज्यों में पर्याप्त खनिज भंडार हैं- उनके पास भारत का 70 प्रतिशत कोयला भंडार, 80 प्रतिशत उच्च श्रेणी का लोहा, 60 प्रतिशत बॉक्साइट और क्रोमियम का भंडार है | एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शीर्ष खनिज उपज वाले जिलों में से आधे आदिवासी हैं और उनके पास 28 प्रतिशत का वन भाग भी है, जो राष्ट्रीय औसत 20.9 प्रतिशत से अधिक है |”

तुलसी गौड़ा जैसे समर्पित और निष्ठावान लोग गुमनाम तरीके से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते रहते है और अपने जीवन के संघर्ष का बखूबी मुकाबला करते | लेकिन सच ही है कि निस्वार्थ संघर्ष कभी विफल नही होता | 

संघर्ष मनुष्य जीवन की वह तपन है, जिससे गुजरने के बाद ही वह अपने उद्देश्य के पथ पर बढ़ सकते हैं |

Jagdisha आपके पर्यावरण के प्रति समर्पण और महत्वपूर्ण योगदान के लिए कोटी-कोटी नमन करते है | म आपके स्वस्थ जीवन की कामना करते है |

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