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प्रतिभा राय ओड़िया भाषा की लेखिका हैं | उन्हें गणतंत्र दिवस 2022, के मौके पर पद्म भूषण से सम्मानित किया गया | 

वर्ष 2007 में, कला और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें भारतीय सरकार ने “पद्मश्री” से भी सम्मानित किया था |

वह वर्ष 2011 के लिए 47वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित है |

प्रतिभा जी एक शिक्षिका और लेखिका हैं | उन्होंने अपने उपन्यासों के माध्यम से सामाजिक अन्याय और भष्ट्राचार के विरुद्ध अपनी कलम द्वारा बुलंद आवाज़ उठाई | 

उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय साहित्यिक और शैक्षिक सम्मेलनों में भाग लेने के लिए भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर यात्रा की है |

प्रतिभा जी ने उपन्यास, लघु कथाएँ, बाल कहानियाँ, आत्मकथा, अनुवाद सहित कई खंडों में गीतों की रचनाएँ की हैं | उनका पहला उपन्यास वर्षा बसंत बैशाख है |

उड़ीसा की बोंडा पहाड़ियों के बोंडा जनजाति पर उनके नृशास्त्रीय अध्ययन को अधिभूमि नाम से प्रकाशित किया गया है | इसे नृशास्त्रीय अध्ययन पर एक श्रेष्ठ कृति माना जाता है |

वर्ष 1991 में, प्रतिभा जी उनके उपन्यास ‘याज्ञसेनी” के लिए मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित हुई | वे इस पुरस्कार से गौरवान्वित होने वाली पहली महिला हैं |

उनके द्वारा रचित अब तक 20 उपन्यास, 24 लघुकथा संग्रह, 10 यात्रा वृत्तांत, दो कविता संग्रह और कई निबंध प्रकाशित हो चुके हैं | उनकी प्रमुख रचनाओं का देश की प्रमुख भारतीय भाषाओं व अंग्रेजी समेत दूसरी विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है | 

उनके प्रसिद्द उपन्यास शिलापद्म का हिन्दी में कोणार्क के नाम से और याज्ञसेनी का द्रौपदी के नाम से अनुवाद हुआ, जो हिन्दी में काफ़ी पढ़े जाने वाले उपन्यासों में से हैं |

उन्होंने अपने रचनात्मक लेखन के लिए कई राष्ट्रीय और राज्य पुरस्कार जीते हैं |

जन्म और शिक्षा

प्रतिभा जी का जन्म 21 जनवरी 1943 को, जगतसिंहपुर जिले के बालिकुडा क्षेत्र के एक दूरस्थ गाँव अल्बोल में हुआ था | जो पहले ओडिशा राज्य के कटक जिले में था |

उन्होंने नौ साल की उम्र से ही लिखना आरंभ कर दिया था | 

पहली बार जब से उन्होंने लिखना शुरू किया था तब से अब तक “सामाजिक समानता, प्रेम, शांति और एकीकरण पर आधारित” उनकी खोज जारी है | 

जब उन्होंने एक सामाजिक व्यवस्था के लिए समानता के आधार पर लिखा, बिना किसी वर्ग, जाति, धर्म या लिंग भेदभाव के, उनके कुछ आलोचकों ने उन्हें साम्यवादी और कुछ ने नारीवादी कहा |  

लेकिन वह कहती है “मैं एक मानवतावादी हूं | समाज के स्वस्थ कामकाज के लिए पुरुषों और महिलाओं की संरचना भिन्न है | महिलाएं प्राकृतिक रूप से जिन विशेषताओं से संपन्न है, उनका सम्मान किया जाना चाहिए | हालांकि एक इंसान के रूप में, महिला पुरुष के समान है ” |

उनकी शादी कुडापाड़ा जगतसिंहपुर, ओडिशा के एक इंजीनियर अक्षय चंद्र राय के साथ हुईं  | आद्याशा, अन्वेष और ऐसकान्त उनकी तीन संतानें हैं |

उन्होंने एम.ए. से मास्टर डिग्री प्राप्त की | अपने बच्चों की परवरिश करते हुए उन्होंने शैक्षिक मनोविज्ञान में पीएचडी की हैं | उनका पोस्ट-डॉक्टोरल शोध ओडिशा, भारत के सबसे आदिम जनजातियों में से एक, बॉन्डो पहाड़ी के आदिवासीवाद और आपराधिकी पर था |

करियर

प्रतिभा जी एक प्रख्यात कथा-लेखक हैं | वह अपनी मातृभाषा ओडिया में उपन्यास और लघु कथाएँ लिखती हैं | वर्ष 1974 में, उन्होंने उनका पहला उपन्यास बरसा बसंता बैशाखा प्रसारित किया, जो लोगों द्वारा बहुत पसंद किया गया |

प्रतिभा जी ने अपनी शादी के बाद भी अपने लेखन कार्य को जारी रखा | उन्होंने एक स्कूल शिक्षक के रूप में अपने पेशेवर कार्यकाल की शुरुआत की | उन्होंने हमेशा अपनी लेखनी, शिक्षण और परिवार में संतुलन बनाएँ रखा |

उन्होंने तीस सालों तक ओडिशा के विभिन्न सरकारी कॉलेजों में प्रशिक्षण दिया | उन्होंने कई डॉक्टरेट अनुसंधान का मार्गदर्शन किया है, और कई शोध लेख प्रकाशित किए हैं | 

प्रतिभा जी ने राज्य सरकार सेवा से प्रशिक्षक के रूप में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और ओडिशा के लोक सेवा आयोग के सदस्य के रूप में शामिल हो गईं | 

उन्होंने अक्टूबर, 1999 के ओडिशा के भयानक चक्रवात के बाद चक्रवात प्रभावित क्षेत्रों में काम किया है | वह चक्रवात प्रभावित क्षेत्रों के अनाथों और विधवाओं के पुनर्वास के लिए भी काम कर रही है |

उनका उपन्यास ‘मगनमति’ 1999 के चक्रवात पर आधारित है |

प्रतिभा जी की हमेशा से सामाजिक सुधार कार्यों में रूची रही हैं | और उन्होंने कई अवसरों पर सामाजिक अन्याय के विरुद्ध लड़ाई लड़ी है |

उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण संघर्ष, वह पुरी के जगन्नाथ मंदिर के उच्च पुजारियों द्वारा रंग जाति धर्म के भेदभाव का विरोध कर रही हैं | वह वर्तमान में अपने अखबार के लेख के लिए पुजारियों द्वारा दर्ज कराए गए मानहानि के मुकदमे को लड़ रही है | जिसमें उन्होंने पुजारियों के अवांछनीय व्यवहार के खिलाफ लिखा है, जिसका शीर्षक है ‘ द कलर ऑफ रिलीजन इज ब्लैक’ |

प्रतिभा जी कई शिक्षित संस्थानों की सदस्य हैं | वह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया, सेंट्रल एकेडमी ऑफ लेटर्स आदि से जुड़ी हुई हैं | 

प्रतिभा जी अपने लेखन का श्रेय अपने माता-पिता और पति को देती हैं |

यात्रा

उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय साहित्यिक और शैक्षिक सम्मेलनों में भाग लेने के लिए भारत और भारत से बहार अन्य देशों की बहुत सी यात्राएँ की है | 

प्रतिभा जी ने वर्ष 1986 में, ISCUS द्वारा प्रायोजित एक सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम में तत्कालीन USSR के पांच गणराज्यों का दौरा किया था |

उन्होंने वर्ष 1994 में इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित “इंडिया टुडे 94” भारत मेले में एक भारतीय लेखक के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व किया | 

उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के कई विश्वविद्यालयों में भारतीय साहित्य और भाषाओं पर अध्ययन और वार्ता दी | संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस का भी उन्होंने अध्ययन पर दौरा किया |

प्रतिभा जी ने वर्ष 1996 में बांग्लादेश में भारत महोत्सव में एक भारतीय लेखक के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व किया | एक भारतीय प्रतिनिधि के रूप में जून वर्ष 1999 में नॉर्वे के ट्रोम्सो विश्वविद्यालय में महिलाओं पर 7वीं अंतर्राष्ट्रीय अंतःविषय कांग्रेस में भाग लिया |

उन्होंने 1999 में नॉर्वे, स्वीडन, फ़िनलैंड और डेनमार्क के दौरे किये | उच्च शिक्षा में लिंग समानता पर तीसरे यूरोपीय सम्मेलन में एक पेपर पेश करने के लिए वर्ष 2000 में ज्यूरिख, स्विट्जरलैंड का भी दौरा किया |

रचनाएँ

उपन्यास : बर्षा बसन्त बैशाख, 1974; अरण्य़, 1977; निषिद्ध पृथिबी, 1978; परिचय़, 1979; अपरिचिता, 1979; पूण्य़तोय़ा, 1979; मेघमेदुर, 1980; आशाबरी, 1980; अय़मारम्भ, 1981; नीलतृष्णा, 1981; समुद्रर स्वर, 1982; शिलापदम, 1983; याज्ञसेनी, 1984; देहातीत, 1986; उत्तरमार्ग, 1988; आदिभूमि; महामोह, 1998; मग्नमाटि, 2004

लघु कहानी संग्रह: सामान्य़ कथन, 1978; गंगा शिउली, 1979; असमाप्त, 1980; ऐकतान, 1981; अनाबना, 1983; हातबक्स, 1983; घास ओ आकाश; चन्द्रभागा ओ चन्द्रकला, 1984; श्रेष्ठ गलप, 1984; अब्य़क्त, 1986; इतिबृति, 1987; हरितपत्र, 1989; पृथक इश्वर, 1991; भगबानर देश, 1991; मनुष्य़ स्वर, 1992; स्वनिर्बाचित श्रेष्ठ गल्प, 1994; षष्ठसती, 1996; मोक्ष, 1996; उल्लंघन, 1998; निबेदनमिदम, 2000; गान्धी, 2002; झोटि पका कान्त, 2006

पुरस्कार

  • ओडीशा साहित्य अकादमी पुरस्कार (1985)
  • झंकार पुरस्कार (1988)
  • ओडिशा साहित्य का सर्वोच्च सरला दास पुरस्कार (1990)
  • मूर्तिदेवी पुरस्कार (1991)
  • केरल स्थित अमृता कृति पुरस्कार, (2006)
  • भारत सरकार का पदम् श्री (2007)
  • ज्ञानपीठ पुरस्कार (2011)
  • ओडिशा लिविंग लीजेंड अवार्ड (साहित्य)- 2013
  • भारत सरकार का पदम् भूषण (2022)

यूँ ही नही सफलता मिलती, उसके लिए संघर्ष करना होता हैं | सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है | फिर बिना योग्यता सिद्ध किये कोई प्रसिद्धि की ऊँचाई कैसे प्राप्त कर सकता है | इसलिए धैर्य, सकंल्प, आत्मविश्वास, निरंतरता, और अभ्यास के साथ अपने पथ पर बढ़ते रहिए |

Jagdisha आपके साहित्य जगत में उत्कृष्ट योगदान के लिये आपको प्रणाम करते है | हम आपके स्वस्थ जीवन की कामना करते है |

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