rani chennamma

हमारा इतिहास गवाह है, कि महिलाएं साहस, वीरता, देशप्रेम, बलिदान और संघर्ष का सर्वोच्च उदाहरण रही है | यहाँ तक की स्वतंत्रता का बिगुल भी देश कि महिलाओं ने ही बजाया था | 

सर्वप्रथम रानी वलु नचियार (1780) ने अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए थे | 

रानी लक्ष्मी बाई से पहले, साल 1824 में कर्नाटक के कित्तूर की रानी चेन्नम्मा ने युद्ध में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे | रानी चेन्नम्मा ने दो बार युद्ध में अंग्रेजों का खून सूखा दिया था | लेकिन तीसरे हमले को न संभाल पाई और युद्ध में असफलता का मुँह देखना पड़ा | फिर अंग्रेजों द्वारा उन्हें कैद कर लिया गया | उस कैद में ही पाँच साल बाद उनका निधन हो गया था |

 

Rani Chennamma Biography in Hindi

जन्म और प्रारंभिक जीवन

रानी चेन्नम्मा का जन्म 24 अक्टूबर,1778 को कर्नाटक के बेलगाम के छोटे से गाँव ककाती में लिंगायत समुदाय में हुआ था | उनके पिता धूलप्पा देसाई और माँ पद्मावती थी | 

उन्हें बचपन से ही घुड़सवारी, तलवारबाजी और तीरंदाजी का बहुत शौक था | वे छोटी उम्र में ही घुड़सवारी, शास्त्र विद्या, और आखेट में कौशल हो गई थी | साथ ही उन्होंने कन्नड, मराठी, संस्कृत और उर्दू भाषाओं का अध्ययन भी किया |

एक बार उनके गाँव में एक बाघ ने आतंक मचा रखा था | फिर क्या निकल पड़ी 15 वर्षीय चेन्नमा आखेट के लिए | उस समय कित्तूर के राजा मल्लसर्ज भी आखेट के लिए ककाती आये तो उन्हें बाघ के आतंक की सूचना मिली | वह झट बाघ की खोज में निकल पड़े |

राजा ने जैसे ही बाघ को देखा उन्होंने उस पर बाण चला दिया | तीर लगते ही बाघ गिर गया | राजा तुरंत बाघ के निकट पहुंचे, लेकिन वह अचंभित हो गए क्योंकि बाघ को एक नहीं दो-दो बाण चुभे थे | तब ही झाड़ियों से सैनिक वेशभूषा में सजी एक कन्या बाहर निकली |

राजा को देखते ही कन्या कुद्ध स्वर में बोली, आपको क्या अधिकार था जो आपने मेरे आखेट में विघ्न डाला | राजा कुछ न बोल पाये और कन्या की वीरता और सौन्दर्य पर मुग्ध हो गये | राजा ने कन्या को शादी का प्रस्ताव दे दिया | उन्होंने भी वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया |

15 साल की उम्र में ही रानी चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के राजा मल्लसर्ज के साथ हो गया | उनका एक बेटा हुआ | हर प्रकार से उनका जीवन सुख-समृद्धी से परिपूर्ण था |

72 दुर्गों और 358 गांवों से संयुक्त कित्तूर का सुंदर राज्य था | उन दिनों कित्तूर व्यापार का प्रसिद्ध केंद्र था | यहां हीरे, जवाहरात के बाजार लगते थे, जिसके लिये दूर-दूर से व्यापारी आते थे | संपन्न कित्तूर उन दिनों शांति की सांस ले रहा था | लेकिन कहते है न समय हमेशा एक सा नही होता | 

1816 में उनके पति की मृत्यु हो गई | इस दुख से रानी चेन्नम्मा उभर ही रही थी, लेकिन प्रकृति ने उनके साथ एक ओर क्रूर खेल खेला और 1824 में उनके पुत्र की भी मृत्यु हो गई |

जिसके पश्चात रानी चेनम्मा ने, शिवलिंगप्पा नाम के एक बच्चे को गोद ले उसे उत्तराधिकारी बनाने का फैसला लिया |

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी कित्तूर पर अपनी आँख गड़ाये बैठे थे | लालची अंग्रेज तो कैसे भी संपन्न कित्तूर के राजकोष और हीरे-जवाहरातो को हथियाना चाहते थे | उन्हें तो जैसे मौका ही मिल गया था | उन्हें कहाँ यह बात हजम होने वाली थी | बस दे दिया रानी चेन्नम्मा को डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स का हवाला |

डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स (हड़प नीति) के तहत अगर किसी राजा की मौत बिना किसी वारिस के हो जाती थी, तो उसका राज्य ब्रिटिश कंपनी के अधीन आ जाता था | उस समय के गवर्नर जनरल डलहौजी ने यह नीति बनाई थी | 

हालांकि उस समय तक हड़प नीति लागू नहीं हुई थी, फिर भी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1824 में कित्तुरु पर कब्जा कर लिया |

उन्होंने रानी को आदेश जारी किया कि, वे शिवलिंगप्पा को सिंहासन से निष्कासित कर दें |

रानी ने बॉम्बे प्रेसिडेंसी के लेफ्टिनेंट गवर्नर लॉर्ड एल्फिन्स्टन को चिट्ठी भेज कर कित्तूरके मामले में दखल करने की मांग की | लेकिन उनकी कहाँ सुनी जाने वाली थी |

कित्तूर का राज्य धारवाड़ कलेक्टोरेट जिसका इन्चार्ज था सार्जेंट जॉन ठाकरे, कमिश्नर मिस्टर चैप्लिन के आधीन आ गया | कित्तूर को सन्देश भेजा गया, कंपनी का राज स्वीकार कर लो |

पर रानी चेन्नम्मा ने स्पष्ट उत्तर दिया कि उत्तराधिकारी का मामला हमारा अपना मामला है, अंग्रेज़ों का इससे कोई लेना-देना नहीं | साथ ही उन्होंने अपनी जनता से कहा कि, जब तक तुम्हारी रानी की नसों में रक्त की एक भी बूँद है, कित्तूर को कोई नहीं ले सकता |

रानी चेनम्मा पहली महिलाओं में से थीं जिन्होंने अनावश्यक हस्तक्षेप और कर संग्रह प्रणाली को लेकर अंग्रेजों का विरोध किया |

आधा राज्य देने का लालच देकर अंग्रेजों ने कित्तूर राज्य के यल्लप्प शेट्टी और वेंकटराव नामक दो देशद्रोही को अपने साथ मिला लिया | जिसके बदले वो कित्तूर के सभी राज देने के लिये तैयार हो गये |

रानी चेन्नम्मा का संघर्ष

ब्रिटिश आदेश को ठुकरा देने बाद एक भीषण युद्ध की स्थिति ने जन्म लिया |

23 सितंबर 1824 को कित्तूर के किले को अंग्रेजों ने चारो ओर से घेर लिया | अंग्रेज 20,000 सिहापियों और 400 बंदूकों के साथ कित्तूर पर हमला करने को तैयार थे | सार्जेंट जॉन ठाकरे ने किले के बाहर से धमकी दी, तभी अचानक किले का फाटक खुला और मर्दाने वेश में रानी चेन्नम्मा शेरनी की भांति अंग्रेज़ों की सेना पर टूट पड़ी |

उनके पीछे दो हजार सैनिकों की फौज थी | उनकी सेना की कमान बालर्ण्या, रायर्ण्या, गजवीर और चेन्नवासप्पा आदि योद्धाओं के हाथों में थी | रानी चेन्नम्मा की तलवार मानो रक्त की प्यासी थी | जॉन ठाकरे मारा गया और अंग्रेज़ सेना भाग खड़ी हुई | देशद्रोही यल्लप्पा शेट्टी और वेंकटराव को भी मृत्यु के घाट उतार दिया गया |

दो ब्रिटिश अधिकारियों सर वॉल्टर एलियट और स्टीवेंसन को बंधक बना लिया गया | अंग्रेजों ने वादा किया कि अब युद्ध नहीं करेंगे तो रानी चेन्नम्मा ने ब्रिटिश अधिकारियों को आजाद कर दिया |

लेकिन हमेशा से धोखा देते आए इन अंग्रेज़ों ने उस वक्त भी धोखा दिया और अपने वादे को तोड़ दिया | अपनी हार का बदला लेने के लिए ब्रिटिशों ने एक बार फिर कित्तूर पर हमला कर दिया |

कित्तूर के किले पर अंग्रेजों ने दूसरा बड़ा घेरा 3 दिसंबर 1824 को किया | इस बार अंग्रेजों की सेना की कमान डीकन के हाथ में थी | अंग्रेजों के पास सेना भी अधिक थी और हथियार भी अधिक थे | लेकिन कित्तूर के देशभक्तों की वीरता के सामने उन्हें एक बार फिर मुँह की खानी पड़ी |

5 दिसंबर 1824 को दो दिन बाद एक बार फिर अंग्रेजी सेना ने कित्तूर पर अधिक वेग के साथ हमला कर दिया | कित्तूर की बची हुई आधी शक्ति को इकट्ठा कर रानी चेन्नम्मा ने एक बार फिर अंग्रेजों के आक्रमण का सामना किया | लेकिन अंग्रेजों की भारी सेना के सामने इस बार वे अपना पैर न पसार पाई | वही कुछ देशद्रोहियों ने कित्तूर की रही-सही शक्ति की कमर तोड़ दी थी |

इस युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने रानी चेन्नम्मा को बंधक बना लिया |

अंग्रेजों ने कित्तूर को पूरी तरह लूट लिया | रानी चेन्नम्मा को बेलहोंगल के दुर्ग में कारागार में डाल दिया गया |

गुरु सिद्दप्पा सहित कित्तूर के बीस सरदारों को फांसी दे दी गई | अकेले रायर्ण्या बचकर भाग निकले | कुछ वर्षों तक वह अग्रज़ों को खूब छकाते रहे, लेकिन गुप्तचरों की सहायता से अंत में पकड़े गए | उन्हें भी फांसी पर चढ़ा दिया गया |

ऐसा माना जाता है कि, रानी चेन्नम्मा ने अपने जीवन के अंतिम पांच वर्ष, किले में कैद होने के बावजूद भी, पवित्र ग्रंथों को पढ़ने और भक्ति में बिताए थे | ब्रिटिशों की कैद में ही उन्होंने 21 फरवरी 1829 को अंतिम सांस ली थी |

रानी चेनम्मा को उनकी वीरता के लिए आज भी याद किया जाता है | वे भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत थीं | और आज भी उनकी वीरता हर महिला के लिए प्रेरणा पुंज है |

Jagdisha का रानी चेन्नम्मा को कोटी-कोटी प्रणाम |

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