savitri bai khanolkar param vir chakra

किसी को भी प्रसिद्धी जन्म से नही अपितु कर्म से मिलती है | आपका ज्ञान, समझ और बुद्धिमता आपकी प्रतिष्ठा को अलंकृत करते है |

भारतीय संस्कृति, वेदों और उपनिषदों में अनंत ज्ञान समाहित है | 

पश्चिम में जन्मी महिला ने इसी ज्ञान सागर में डुबकी लगा भारतीय संस्कृति, इतिहास और ग्रंथों के सूचक चिन्हों के अद्भुत मेल से सर्वोच्च भारतीय सैनिक अलंकरण परमवीर चक्र का रूपांकन किया |

जिनका जन्म तो पश्चिम में हुआ किंतु उन्होंने संपूर्ण रूप से भारतीय संस्कृति को अपनाया | और भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया | 

युद्ध में वीरता, अदम्य साहस और बलिदान के लिए वीर सैनिकों को दिया जाने वाला परमवीर चक्र हमारे देश का सर्वोच्‍च सैन्‍य सम्‍मान है | भारत के वायु, जल और थल सेना के सैनिक जब देश सेवा की शपथ ग्रहण करते है, उसी पल से सभी सैनिकों का सबसे बड़ा सपना होता है कि उन्हें ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया जाए |

परमवीर चक्र, प्रमाण है किसी सैनिक की बहादुरी और उसके उस जज्‍बे का जो उसने निस्‍वार्थ भाव से अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए दिखाया है |

परमवीर चक्र अब तक 21 वीर योद्धाओं को दिया जा चुका है |

परमवीर चक्र को रूप, रंग और आकार सावित्री बाई खानोलकर ने दिया | इनका जन्म का नाम इवा योन्ने लिण्डा माडे-डी-मारोज़ जोकि मूल रूप से स्‍विटजरलैंड की रहने वाली थी |

उन्होंने एक भारतीय सैन्य अधिकारी कैप्‍टन विक्रम खानोलकर से प्रेम विवाह कर हिन्दु धर्म अपना लिया था | विवाह के बाद उन्होंने अपना नाम इवा योन्ने लिण्डा माडे-डी-मारोज़ से बदलकर सावित्री बाई खानोलकर पसंद किया |

सावित्री बाई खानोलकर हमेशा कहती थी कि यूरोप में उनका जन्म गलती से हो गया | उनके हृदय में केवल भारत बसता था | कोई उन्हें विदेशी कहे, यह उन्हें बिल्कुल पसंद नही था | 

वह भारतीय संस्‍कृति से इतना प्रभावित थीं कि उन्‍होंने देश के इतिहास, वेदों और यहां तक की महान भारतीय लोगों के बारे में भी पढ़ डाला था |

जन्म और प्रारंभिक जीवन

इवा योन्ने लिण्डा माडे-डी-मारोज़ का जन्म 20 जुलाई 1913 को स्विट्ज़रलैंड में हुआ था | इवा के पिता आंद्रे डी मैडे मूल रूप से हंगरी और मां मार्टे हेंट्जेल रूसी महिला थीं | इवा के पिता जिनेवा यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर और लीग ऑफ़ नेशन्स में पुस्तकालयाध्यक्ष भी थे | वहीं उनकी मां मार्टे हेंट्जेल इंस्टीट्यूट जीन-जैक्स रूसौ में शिक्षिका थीं |

 

इवा के जन्म के बाद ही उनकी मां की मृत्यु हो गई | जिसके बाद इवा की परवरिश उनके पिता ने अकेले ही की | उन्होंने अपनी शिक्षा रिवियेरा के एक स्‍कूल से प्राप्त की |

पिता के पुस्तकालय (लायब्रेरी) में काम करने के कारण छुट्टी के दिनों में उनका अधिकतर समय किताबें पढ़ने में गुजरता | अपनी पढ़ने की जिज्ञासा के कारण उन्होंने बहुत सी भारतीय संस्कृति की किताबें भी पढ़ी | और भारतीय संस्कृति के प्रति उनका गहरा आकर्षक हुआ | जिसका प्रभाव उनकी आगे की जिंदगी में दिखने वाला था |

साल 1929 में वह अपने पिता तथा अन्य परिवार के सदस्यों के साथ रिवियेरा के समुद्रतट पर छुट्टी मनाने गई थी | उस दौरान उनके पिता ने उनका परिचय भारतीयों के एक समूह से करवाया जो सैंडहर्स्ट से वहाँ छुट्टियाँ मनाने पहुँचा था | इस समूह में ब्रिटेन के सेन्डहर्स्ट मिलिटरी कॉलेज के एक भारतीय छात्र विक्रम रामजी खानोलकर भी थे | वे पहले भारतीय थे जिससे इवा का परिचय हुआ | और उनसे उन्हें प्यार हो गया |

इवा ने विक्रम रामजी खानोलकर से उनका पता ले लिया था | विक्रम सैंडहर्स्ट लौट गए लेकिन वे दोनों पत्रों के माध्यम से संपर्क में रहे | 

पढ़ाई पूरी करने के बाद विक्रम भारत लौटे ओर भारतीय सेना की 5/11 सिख बटालियन से जुड़ गए | अब वे कैप्टन विक्रम खानोलकर हो गए थे | उनकी सबसे पहली पोस्टिंग औरंगाबाद में हुई | 

इवा के साथ उनका पत्राचार अभी भी जारी था | वह कैप्टन विक्रम खानोलकर से शादी करना चाहती थी | लेकिन उनके पिता इस रिश्‍ते के विरूद्ध थे क्योंकि वह अपनी बेटी को भारत जैसे दूर देश में नहीं भेजना चाहते थे | लेकिन इवा अपने इरादे की पक्की थी और कैप्‍टन विक्रम से शादी के लिए अड़ी रही |

इवा से सावित्री बाई बनने के बाद का सफर

1932 में 19 वर्ष की उम्र में इवा भारत आ गई | उन्होंने भारत आते ही कैप्टन विक्रम को अपना निर्णय बता दिया कि वह उन्हीं से शादी करेगी | घर वालों के थोड़े विरोध के बाद सभी ने इवा को अपना लिया | साल 1932 में ही मराठी रिवाजों के साथ उनकी शादी कैप्टन विक्रम के साथ हो गई |

विवाह के बाद इवा का नया नाम सावित्री बाई खानोलकर हो गया |

विवाह के बाद सावित्री बाई ने पूर्ण रूप से भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म अपना लिया | साथ ही महाराष्ट्र में पहने जाने वाली 9 गज़ की साड़ी पहनना शुरु कर दिया | वह पूर्ण रूप से शाकाहारी बन गईं | 2 वर्षों के अंदर ही वे शुद्ध मराठी ओर हिन्दी भाषा बोलने लगीं, मानों उनका जन्म भारत में ही हुआ हो | जो उन्हें पहले से न जानता हो, वो यह कह ही नही सकता था कि वे एक विदेशी महिला थी |

कैप्टन विक्रम जब मेजर बने तो उनका तबादला पटना हो गया | जिसके बाद सावित्री बाई पति के साथ पटना में रहने चली गईं | वही से उनके जीवन को एक नई दिशा मिली | 

सावित्री बाई ने पटना विश्वविद्यालय से सांस्कृतिक नाटक, वेदांत, उपनिषद और हिन्दू धर्म पर गहन अध्ययन किया | 

जिसके बाद सावित्री बाई स्वामी रामकृष्ण मिशन से जुडकर प्रवचन देने लगीं | 

सावित्री बाई चित्रकला और पैन्सिल रेखाचित्र बनाने में भी पारंगत थीं |  भारतीय पौराणिक प्रसंगों पर चित्र बनाना उनके प्रिय शौक थे | उन्होने पं. उदय शंकर (पंडित रविशंकर के बड़े भाई) से नृत्यकला भी सीखी |

उन्होंने अंग्रेज़ी में सेंट्स ऑफ़ महाराष्ट्र एवं संस्कृत डिक्शनरी ऑफ़ नेम्स नामक दो पुस्तकें भी लिखीं |

मेजर विक्रम अब लेफ़्टिनेन्ट कर्नल बन चुके थे | भारतीय स्वतंत्रता के बाद 1947-48 भारत-पाक युद्ध में अदम्‍य साहस दिखाने वाले वीरों को सम्‍मानित करने के लिए भारतीय सेना नए पदक तैयार करने पर काम कर रही थी |

मेजर जनरल हीरा लाल अट्टल को पदक का रूपांकन करने के लिए सावित्री बाई सबसे योग्य लगीं | वे ज्ञान का भंडार थी | उन्हें भारतीय संस्कृति, वेदों पौराणिक प्रसंगों की अच्छी समझ थी | साथ ही वे एक कलाकार थीं | मेजर अट्टल ऐसा पदक चाहते थे जो भारतीय गौरव को प्रदर्शित कर सके | सावित्री बाई ने उन्हें निराश नहीं किया और ऐसा पदक बना कर दिया जो भारतीय सैनिकों के त्याग और समर्पण को दर्शाता है |

पदक का रूपांकन

सावित्री बाई को पदक के रूपांकन के लिये इन्द्र का वज्र सबसे योग्य लगा क्योंकि वज्र महर्षि दधीचि की अस्थियों से बना था | इस वज्र के लिये महर्षि दधीची ने अपने प्राणों का त्याग कर दिया था | महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने शस्त्र वज्र को धारण कर इन्द्र वज्रपाणी कहलाए ओर वृत्रासुर का संहार किया |

साथ ही सावित्री बाई महावीर योद्धा छत्रपति शिवाजी को श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहती थी | उन्होंने शिवाजी के अद्भुत साहस और वीरता को दर्शाने के लिए प्रतीक स्वरूप उनकी तलवार भवानी को सुनिश्चित किया |

सावित्री बाई ने पदक का ऐसा डिजाइन बनाया जिसमें इंद्र के वज्र को शिवाजी की तलवार भवानी से दोनों तरफ से घेर लिया गया था |

परमवीर चक्र का पदक कांस्य धातु से 3.5 से.मी के व्यास का बनाया गया है | इसमें चारों ओर तलवारों से घिरे वज्र के चार चिह्न अंकित हैं | पदक के बीच का हिस्सा उभरा हुआ है और उस पर राष्ट्र का प्रतीक चिह्न उत्कीर्ण है | पदक के दूसरी ओर कमल का चिह्न है, और हिन्दी व अंग्रेज़ी में परमवीर चक्र लिखा हुआ है |

डिजाइन पास होने के बाद परम वीर चक्र, भारत के सभी सैन्य शाखाओं के अधिकारियों के लिए सर्वोच्च वीरता पुरस्कार के रूप में मान्य हुआ | 

परम वीर चक्र, 26 जनवरी 1950 को भारत के पहले गणतंत्र दिवस पर पेश किया गया था |

संयोग की बात है कि पहला परम वीर चक्र सावित्री बाई की पुत्री के देवर मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत प्रदान किया गया | जो वीरता पूर्वक लड़ते हुए 3 नवम्बर 1947 को शहीद हुए थे | 

1947-48 भारत – पाक युद्ध में मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी ने श्रीनगर हवाई अड्डे तथा कश्मीर की रक्षा करते हुए 300 पकिस्तानी सैनिकों को धूल चटाई थी | जिसमें भारत के लगभग 22 सैनिक शहीद हुए थे | मेजर सोमनाथ शर्मा को वीरगति के लगभग 3 वर्ष बाद 26 जनवरी 1950 को यह पदक प्रदान किया गया |

परम वीर चक्र के अलावा ओर दूसरे पदको का भी किया रूपांकन

सावित्री बाई ने परमवीर चक्र डिजाइन के अलावा दूसरे बड़े सैन्‍य वीरता पुरस्‍कारों को भी डिजाइन किया | उन्होंने महावीर चक्र, कीर्ति चक्र, वीर चक्र, और शौर्य चक्र को भी डिजाइन किया |

सावित्री बाई ने जनरल सर्विस मेडल 1946 को भी डिजाइन किया था | जो 1965 तक चलन में रहा |

भारत – पाक युद्ध के बाद उन्होंने अपना जीवन युद्ध में विस्थापित सैनिकों की सेवा में समर्पित किया | 

साल 1952 में मेजर जनरल विक्रम खानोलकर का देहांत हो गया | पति की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने जीवन को अध्यात्म की तरफ़ मोड लिया | वे दार्जिलिंग के राम कृष्ण मिशन में चली गयीं | उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में समाजसेवा के अनेक काम किए | अपने जीवन के अन्तिम वर्ष उन्होंने अपनी पुत्री मृणालिनी के साथ बिताए | 

26 नवम्बर 1990 को सावित्री बाई पंच तत्वों में विलीन हो गईं  |

महान व्यक्तित्व केवल ज्ञान के प्रकाश से ही प्रज्वलित हो सकता है | हमे ज्ञान की प्राप्ति के लिए इधर-उधर कुछ ढूढ़ने की आवश्यकता नही बल्कि हमारे ग्रंथ, वेदों और उपनिषद समुच्चय ज्ञान का स्त्रोत है |

Jagdisha का महान चित्रकार, वेदों और उपनिषद की ज्ञाता को सहृदय प्रणाम |

 

 

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