lata mangeskar

मृदुल, सौम्य और सुरीले स्वरों का महान संयोजन था उनकी आवाज में, यूँ ही नही कहलाई सूरो की महारानी! लता मंगेशकर स्वरो की साम्राज्ञी थी | उनकी गायकी में एक अलग ही जादू था, जो किसी को भी मंत्रमुग्ध कर दे | मानो माँ सरस्वती का असीम आशीर्वाद था उनके पास | जिनका छः दशकों का कार्यकाल उपलब्धियों से भरा पड़ा है | भारत ही नही विश्व भर के लोग उनकी मधुर आवाज के दिवाने है| उन्होने लगभग तीस से ज्यादा भाषाओं में फ़िल्मी और गैर-फ़िल्मी गाने गाये हैं | लता जी भारत की सबसे लोकप्रिय और आदरणीय गायिका थीं | उनकी मुख्य पहचान भारतीय सिनेमा में एक पार्श्वगायिका के रूप में रही है | प्यार से उन्हें ‘लता दीदी’ कहकर पुकारते हैं | अपनी बहन आशा भोंसले के साथ लता जी का फ़िल्मी गायन में सबसे बड़ा योगदान रहा है | टाईम पत्रिका ने उन्हें भारतीय पार्श्वगायन की अपरिहार्य और एकछत्र साम्राज्ञी स्वीकार किया है | भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘भारतरत्न’ से सम्मानित किया गया था | वे कुछ समय से बीमार थीं | उनकी मृत्यु कोविड से जुड़ी जटिलताओं के कारण 6 फरवरी 2022 को मुम्बई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में हुई | वे बेसक इस दूनिया से अलविदा ले चूकी है, लेकि अपनी महान गायकी और सुरम्य आवाज के रस को विश्व भर में फैला कर गई हैं |

 

यह भी पढ़ें- हर महिला को सशक्त होने के लिए ये जानना बहुत जरूरी हैजन्म और प्रारम्भिक जीवन लता जी का जन्म कर्हाडा ब्राह्मण दादा और गोमंतक मराठा दादी के परिवार में, मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में 28 सितम्बर 1929 में हुआ था | वे मध्यवर्गीय परिवार की बड़ी बेटी थीं | उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर एक मराठी संगीतकार, शास्त्रीय गायक और थिएटर एक्टर थे | उनकी मां शेवंती गुजराती थीं, जो एक गृहणी थीं | शेवंती उनके पिता की दूसरी पत्नी थी | उनकी पहली पत्नी का नाम नर्मदा था, जिसकी मृत्यु के बाद उन्होने उनकी पत्नी की छोटी बहन शेवंती से शादी की | जन्म के समय लता जी का नाम हेमा रखा गया था | जिसे बदल कर उनके पिता ने लता कर दिया था | यह नाम उनके पिता को अपने नाटक ‘भावबंधन’ के एक महिला किरदार लतिका के नाम से सूझा | लता जी की तीन बहने मीना मंगेशकर, आशा भोसले, उषा मंगेशकर और एक भाई हृदयनाथ मंगेशकर हैं | उनके भाई बहनो में सभी ने संगीत को ही अपनी आजीविका के लिये चुना | पहले उनके पिता का सरनेम हार्डीकर था जिसे बदल कर उन्होंने मंगेशकर कर दिया | पंडित दीनानाथ गोआ में मंगेशी के रहने वाले थे और इसके आधार पर उन्होंने अपना नया सरनेम चुना | लता जी की परवरिश महाराष्ट्र मे हुई | उनकी रूची बचपन से ही गायन में थीं | उनके घर में गीत-संगीत और कला का वातावरण रहा, जिससे वे उसी ओर आकर्षित हुईं | पांच वर्ष की उम्र से ही उनके पिता उन्हें संगीत शिक्षा देने लगें | उनके पिता के नाटकों में लता जी अभिनय भी करने लगीं | उन्हें स्कूल भी भेजा गया, लेकिन वे केवल एक ही दिन स्कूल गई | लता जी अपने साथ अपनी छोटी बहन आशा जी को भी स्कूल ले गईं | टीचर ने उनके साथ उनकी बहन को कक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी | इस बात से उन्हें गुस्सा आ गया और वे फिर कभी स्कूल नहीं गईं | 1942 में जब वें केवल 13 वर्ष की थी, तब उनके पिता की मृत्यु हो गईं | यह समय उनके लिए बहुत कठीन था | उनके पिता की मृत्यु के बाद, मंगेशकर परिवार के सबसे करीबी मित्र नवयुग चित्रपट मूवी कंपनी के मालिक मास्टर विनायक (विनायक दामोदर कर्नाटकी) ने उनके परिवार की देखभाल की | साथ ही लता जी का करियर एक अभिनेत्री और गायिक के रूप में सफल बनाने के लिए मदद की | करियर लता जी को अभिनय कुछ खास पसंद नहीं था, लेकिन पिता के जाने के बाद पैसो की किल्लत के चलते उन्होंने कुछ हिंदी और मराठी फिल्मों में अभिनय किया | अभिनेत्री के रूप में उनकी पहली फिल्म पाहिली मंगलागौर (1942) थी | जिसमें उन्होंने स्नेहप्रभा प्रधान की छोटी बहन की भूमिका निभाई | इसके बाद उन्होंने कई फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें, माझे बाल (1943), चिमुकला संसार (1943), गजभाऊ (1944), बड़ी माँ (1945), जीवन यात्रा (1946), माँद (1948), छत्रपति शिवाजी (1952) जैसी फिल्मों में लता ने छोटी-मोटी भूमिकाएं अदा की | उन्होंने खुद की भूमिका के लिये गाने भी गाये | वर्ष 1942 में, लता जी को सदाशिवराव नेवरेकर ने एक मराठी फिल्म में गाने का अवसर दिया | इस प्रकार उन्होंने अपना पहला गीत ‘नाचू या गडे,खेळू साड़ी मणि हाउस भारी’ मराठी फिल्म किती हसाल के लिए गाया | उन्होंने गाना रिकॉर्ड भी किया, लेकिन फिल्म के फाइनल कट से उनका गाना हटा दिया गया | 1942 में रिलीज हुई एक मराठी फिल्म पहिली मंगला गौर में उन्होंने अपना पहला प्रदर्शित गीत ‘नताली चैत्राची नवालाई’ गाया | इस गाने की धुन दादा चांदेकर ने बनाई थी | 1943 में प्रदर्शित मराठी फिल्म ‘गजाभाऊ’ में लता जी ने अपना पहला हिंदी गीत ‘माता एक सपूत की

दुनिया बदल दे तू’ गाया | 1948 में लताजी ने पार्श्वगायिकी में कदम रखा | वह समय इस क्षेत्र में नूरजहां, अमीरबाई कर्नाटकी, शमशाद बेगम और राजकुमारी आदि के स्वरों से गूंज रहा था | ऐसे में उनके लिए अपनी पहचान बनाना इतना आसान नही था | 1995 में संगीत निर्देशक गुलाम हैदर ने लता जी को फिल्म शहीद (1948) के निर्माता सशधर मुखर्जी से मिलाया | उस समय मुखर्जी ने लता जी की आवाज़ को ‘बहुत पतली’ बताते हुऐ उन्हें मना कर दिया | इसके बाद गुलाम हैदर ने कहा था कि आने वाले वर्षो में फिल्म के निर्माता और निर्देशक लता जी के पैर पकड़ कर भीख मांगते आएगे की वह उनकी फिल्मों में गीत गाए | एक साक्षात्कार में, लताजी ने कहा था कि गुलाम हैदर उनके असली गुरु थे, जिन्होंने उनकी प्रतिभा पर विश्वास किया | 1947 में वसंत जोगलेकर ने अपनी फ़िल्म आपकी सेवा में लता जी को गाने का अवसर दिया | इस फ़िल्म के गानों से वें लोगों की चर्चा में आ गईं | इसके बाद उन्होने मज़बूर (1948) फ़िल्म के गानों ‘अंग्रेजी छोरा चला गया’ और ‘दिल मेरा तोड़ा हाय मुझे कहीं का न छोड़ा तेरे प्यार ने’ जैसे गानों से अपनी स्थिती मजबूत बनाई | लेकिन अभी उन्हें उस खास हिट की तलाश थी | ऐसा कहा जाता है कि शुरूआत में उन्होंने प्रसिद्ध गायिका नूरजहां की नकल की, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी स्वयं की गायन शैली को विकसित किया | उर्दू / हिंदी गीत गाते हुए मराठी उच्चारण करने पर दिलीप कुमार ने लता जी पर तंज कसा था | इसके बाद उन्होंने उर्दू का सटीक उच्चारण सीखने की ठान ली और शफी नामक एक उर्दू अध्यापक से उर्दू में उच्चारण करना सीखा | 1947 में गीत “आएगा आनेवाला” फिल्म महल (1949) से लता जी ख्याति मिली | और ऐसा मानते है कि इस गीत को जिस ख़ूबसूरती से लता जी ने गाया, शायद ही ऐसे कोई अन्य गायक गा सकता है | इस गीत को उस समय की सबसे खूबसूरत और चर्चित अभिनेत्री मधुबाला पर फ़िल्माया गया था | इसके बाद लता जी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा | 1950 से 1970 का दशक अनिल बिस्वास, शंकर जयकिशन, सचिनदेव बर्मन, नौशाद, हुस्नलाल भगतराम, सी. रामचंद्र, सलिल चौधरी, सज्जाद-हुसैन, वसंत देसाई, मदन मोहन, खय्याम, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन जैसे नामी संगीतकार मधुर धुनों का निर्माण कर रहे थे | और लता जी सभी की पहली पसंद थी | इन सभी संगीतकारों के साथ लता जी ने अनेक यादगार गीत गाए जो लोकप्रियता के शिखर पर चढ़े | उनकी आवाज का जादू ऐसा चला की लता जी सुप्रसिद्ध गायिका बन गईं | लता जी अपने सहज, सरल और मृदुल स्वभाव के कारण फिल्म निर्माताओं, निर्देशकों और संगीतकारों की पहली पसंद बन गईं | हर गाने में उनका उत्साह झलकता था | लता जी हर गाने में मानो जान डाल देती थी | अब चाहे रोमांटिक गाना हो, राग आधारित हो, भजन हो, देशभक्ति से ओतप्रोत हो | 27 जनवरी 1963 को, चीन-भारत युद्ध के पृष्ठपट से उनके द्वारा गाए गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को सुन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भी आंख झलग पड़ी थी | दीदार, बैजू बावरा, उड़न खटोला, मदर इंडिया, बरसात, आह, श्री 420, चोरी चोरी, सज़ा, हाउस नं 44, देवदास, मधुमति, आज़ाद, आशा, अमरदीप, बागी, रेलवे प्लेटफॉर्म, देख कबीरा रोया, चाचा जिंदाबाद, मुगल-ए-आजम, दिल अपना और प्रीत पराई, बीस साल बाद, अनपढ़, मेरा साया, वो कौन थी, आए दिन बहार के, मिलन, अनिता, शगिर्द, मेरे हमदम मेरे दोस्त, दो रास्ते, जीने की राह जैसी सैकड़ों फिल्मों में लता जी ने गाने गाए | लता जी के मुश्किल से मुश्किल गीत भी बडी सहजता से गा लेती थीं | राज कपूर, बिमल रॉय, गुरुदत्त, मेहबूब खान, कमाल अमरोही जैसे दिग्गज फिल्मकार की पहली पसंद हमेशा लता जी ही रही | संगीत की दुनिया में लता जी सफलता के शीर्ष पर रही हैं | 70 के दशक में उन्होंने पाकीज़ा, प्रेम पुजारी, अभिमान, हंसते जख्म, हीर रांझा, अमर प्रेम, कटी पतंग, आंधी, मौसम, लैला मजनूं, दिल की राहें, सत्यम शिवम सुंदरम जैसी कई फिल्मों में यादगार गीत गाए | अस्सी और नब्बे का दशक अस्सी के दशक में अनु मलिक, शिवहरी, आनंद-मिलिंद, राम-लक्ष्मण जैसे नए संगीकार उभर कर आएं | उन्होंने भी अपने गीतो के लिए लता जी को पसंद किया | लता जी के गाए गीतो की गूंज सिलसिला, फासले, विजय, चांदनी, कर्ज, एक दूजे के लिए, आसपास, अर्पण, नसीब, क्रांति, संजोग, मेरी जंग, राम लखन, रॉकी, फिर वही रात, अगर तुम न होते, बड़े दिल वाला, मासूम, सागर, मैंने प्यार किया, बेताब, लव स्टोरी, राम तेरी गंगा मैली जैसी सैकड़ों फिल्म से गली-गली गूंजती रही | 90 के दशक तक आते आते लता जी ने गाना कम कर दिया | इस दौर में भी डर, लम्हें, दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे, दिल तो पागल है, मोहब्बतें, दिल से, पुकार, ज़ुबैदा, रंग दे बसंती, 1942 ए लव स्टोरी जैसी फिल्मों में लता जी की आवाज ने मधुरता घोली | वे समय-समय पर कहती भी रहीं कि आज के दौर के संगीतकार उनके पास अच्छे गीत का प्रस्ताव लाते हैं तो उन्हें गीत गाने में कोई समस्या नहीं है | लता जी हमेशा अपने सौम्य स्वभाव के लिए जानी गईं | लगभग सभी फिल्म निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, गायक, हीरो, हीरोइनों से उनके पारिवारिक रिश्ते रहे | दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद, अमिताभ बच्चन, यश चोपड़ा, राहुलदेव बर्मन, मुकेश, किशोर कुमार से उनके घनिष्ठ संबंध रहे | पीढ़ी दर पीढ़ी उनके संबंध सभी से मधुर ही रहे | सभी ने उन्हें मान और आदर सम्मान दिया | 1956 में, उनका एक गीत “रसिक बलमा” (चोरी चोरी) ने सर्वश्रेष्ठ गीत के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता | फिल्मफेयर अवॉर्ड 1958 में शुरू किए गए थे और पार्श्व गायकों का कोई भी वर्ग इसमे शामिल नहीं था, इसलिए उन्हें कोई पुरस्कार नहीं मिला, और उनके विरोध के बाद, इस श्रेणी को 1958 में शामिल किया गया था | लता जी को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के लिए पहला फिल्मफेयर पुरस्कार गीत ‘आजा रे परदेसी’ फिल्म मधुमत (1958) के लिए दिया गया| उन्होंने 1958 से 1966 तक सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्वगायक के लिए फिल्मफेयर पुरस्कारों पर जैसे एकाधिकार किया हुआ था | अपनी उदारता का परिचय देते हुए, वर्ष 1969 में उन्होंने फिल्मफेयर पुरस्कार लेने से मना कर दिया ताकि नए लोगो की प्रतिभाओं को बढ़ावा मिल सके | उन्होंने फिल्म परिचय (1972) में सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका के लिए अपने पहले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित हुईं | वह फिल्म लेकिन (1990) के लिए सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्वगायक की श्रेणी में राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड की सबसे पुरनी विजेता (61 वर्षीय) का भी रिकॉर्ड रखती है | लता जी ने संगीत निर्देशक लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए अधिकतम संख्या में लगभग 712 गाने गाए हैं | उन्होंने 1955 में, पहली बार एक मराठी फिल्म ‘राम राम पाव्हणं’ के लिए गीत लिखा था | उन्होंने चार फिल्मों का निर्माण भी किया, जैसे वादाई (मराठी 1953), झिंझर (हिंदी, 1953), कंचन (हिंदी, 1955), लेकिन (हिंदी,1990) | लता जी ने 36 विभिन्न भाषाओं में 50,000 से अधिक गाने गाए हैं | लता जी को वर्ष 1962 में किसी ने हल्का जहर दे दिया था | एक दिन उन्हें सुबह उठते ही पेट में बहुत दर्द हुआ | उन्हें अपनी जगह से हिलने में भी बडी दिक्कत हो रही थी | वह लगभग 3 महीने के लिए बिस्तर पर रहीं | हालांकि उन्हें मारने की कोशिश किसने की, इस रहस्य का पता आज तक नहीं चला |

 

पुरस्कार

 

  • फिल्म फेयर पुरस्कार 

  1. आजा रे परदेसी (मधुमती) (1959)
  2. काहे दीप जले कही दिल (बीस साल बाद) (1963)
  3. तुम मेरे मंदिर तुम मेरी पूजा (खानदान) (1966)
  4. आप मुझसे अच्छे लगने लगे (जीने की राह से) (1979)
  5. फ़िल्मफ़ेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (1993)
  6. फ़िल्मफ़ेयर स्पेशल अवार्ड, दीदी तेरा देवर दीवाना (हम आपके हैं कौन) (1994)
  7. फ़िल्मफ़ेयर स्पेशल अवार्ड, 50 साल पूरे करने वाले फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स के अवसर पर एक गोल्डन ट्रॉफी प्रदान की गई | (2004)
  • सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

  1. फिल्म परी (1972)
  2. फ़िल्म कोरा कागज़(1974)
  3. फिल्म लेकिन (1990)
  • महाराष्ट्र राज्य फिल्म पुरस्कार 

  1. सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका (1966)
  2. सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक (‘आनंदघन’ नाम से) (1966)
  3. जैत रे जैत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका (1977)
  • पद्म भूषण (1969)

  • दुनिया में सबसे अधिक गीत गाने का गिनीज़ बुक रिकॉर्ड (1974)

  • दादा साहब फाल्के पुरस्कार (1989)

  • फिल्म फेयर का लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार (1993)

  • स्क्रीन का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार (1996)

  • राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार (1997)

  • महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार (1997)

  • एन.टी.आर. पुरस्कार (1999)

  • पद्म विभूषण (1999)

  • ज़ी सिनेमा का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार (1999)

  • आई. आई. ए. एफ. का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार (2000)

  • स्टारडस्ट का लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार (2001)

  • भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” (2001)

  • नूरजहाँ पुरस्कार (2001)

  • महाराष्ट्र रत्न (2001)

  • बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन पुरस्कार-

  1. वो कौन थी (1964)
  2. मिलन (1967)
  3. राजा और रंक (1968)
  4. सरस्वतीचंद्र (1969)
  5. दो रास्ते (1970)
  6. तेरे मेरे सपने (1971)
  7. पाकीज़ा (1972
  8. बॉन पलाशिर पदबाली (बंगाली फिल्म) (1973)
  9. अभिमान (1973)
  10. कोरा कागज़ (1975)
  11. एक दूजे के लिए (1981)
  12. ए पोर्ट्रेट आफ लताजी (1983)
  13. राम तेरी गंगा मैली (1985)
  14. अमरसंगी (बंगाली फिल्म) (1987)
  15. लेकिन (1991)

 

लता जी आप जैसे स्वरों की मल्लिका शायद ही अब कभी हो | आपसे हमे निरंतर अभ्यास की एक अचूक सीख मिलती है | 

 

Jagdisha का आपको शत शत नमन |

 



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