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जब कभी भी आप-हम किसी कूडा बिनने या उठाने वाले को देखते है, तब मन में आता ही है कैसे कर लेते है, ये लोग? क्योंकि शायद गंदगी और बदबू के बीच जाकर प्लास्टिक ढूढ़ना और इकट्ठा करना खुशी से तो कोई नही करता| 

कूडाघरो या स्थानीय इलाको के लिए रखे गए कूडेदान में भी आपने कई लोगो को बेढ़गे तरीके से कूडा फैकते देखा होगा| 

इन कूड़े के ढेर में भी कुछ करने की चाह करने वाले खूबसूरती देख ही लेते हैं | अब चमकदार हीरा भी तो कोयले की खान से ही निकलता है | 

कुछ ऐसे ही विचारों की है हमारी आज की कहानी कि पात्र, जिन्होंने कूडे में से भी फैशन ढूँढ लिया| आइए जानते है, कैसे कचरा बीनने वालों को साथ लेकर उन्होंने अपने बिजनेस की शुरूआत कर डाली?

 

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दिल्ली की अनिता आहूजा और उनके पति शलभ आहूजा कंज़र्व इंडिया नामक संस्था बनाकर कूड़े-कचरे को खूबसूरत रूप दे रहे हैं | 

वे प्लास्टिक के कचरे का पुनः उपयोग कर एक्सपोर्ट क्वालिटी के सुन्दर उत्पाद बनाते हैं| उनकी यह पहल न केवल ‘स्वच्छ भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को प्रोत्साहित करता है बल्कि हज़ारों कचरा बीनने वालों को रोजगार का अवसर भी प्रदान करता है| साथ ही, वे लोगों को सफाई, वृक्षारोपण आदि विषयों पर जागरूक भी करते थे |

उनके बिज़नेस में उनकी बेटी कनिका आहूजा  ने भी पूरा साथ दिया| अनीता अहूजा और उनके पति शलभ अहूजा ने साल 1998 में कंज़र्व इंडिया नाम से एक एनजीओ की स्थापना की थी| एनजीओ का लक्ष्य था साफ सफाई और कूड़े व वेस्ट मैटेरीयल का उपयोग करके उसे अन्य प्रयोग में लाना|

अनीता आहूजा का जन्म भोपाल में हुआ था और दिल्ली में वें पली-बढ़ी| उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है| वह एक स्वतंत्रता सेनानी की बेटी हैं| उन्होंने अपना सारा जीवन समाज की सेवा और परिवर्तन में व्यय किया| कचरा बीनने वालों की दुर्दशा देखकर उन्होंने तय किया कि वे उनके जीवन को सुधारने के लिए कुछ करेंगी |

जीवन में कुछ श्रेष्ठतर और परिवर्तनशील करने के उद्देश्य से उन्होंने कचरा बीनने वालों के लिए काम करना शुरू किया|

अपने विचारों को पृष्ठ पर लाने के लिये अनिता जी ने अपने जैसे विचारों वाले दोस्तों और परिवार वालों के साथ मिलकर अपने इलाके में कुछ छोटे-छोटे प्रोजैक्ट लेने का निर्णय लिया| इस प्रोजैक्ट के अंतर्गत सारे इलाके से कचरा एकत्र करना शुरू किया| एकत्रित किये कचरे से रसोई का कचरा अलग कर उसे खाद बनाने के लिए पास के पार्क में रखा जाता था| शुरुआत में ही उन्हें यह अनुभव हो गया कि लक्ष्य तक पहुँचने के लिये अकेले चलना मूर्खता होगी इसलिए अनीता जी ने दूसरी कॉलोनी से भी सहयोग माँगा| 

उनकी एनजीओ कंज़र्व इंडिया ने लगभग 3000 लोगों के साथ मिलकर रेसिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की शुरुआत की| यह एसोसिएशन 2002 में एक फुल टाइम प्रतिबद्धता वाली संस्था बनी जिनके पास खुद के अधिकार थे| चार सालों तक कचरा बीनने वालों के साथ काम करने के बाद उन्होंने अनुभव किया कि उनका जीवन स्तर गरीबी रेखा के स्तर से भी नीचे है| उन्होंने दिल्ली के झुग्गी बस्ती इलाको में देखा था, कि वहाँ कचरा बीननेवाले दिन भर मेहनत करते हैं| लेकिन उन्हें उनके परिश्रम का उचित मूल्य नहीं मिलता| उनका जीवन स्तर सुधारने के लिए ज़रूरी था कि उन्हें कमाई का अच्छा स्रोत दिया जाए|

हमारे समाज में बहुत सारी समस्याएं हैं और एक एनजीओ किसी एक मुद्दे या समुदाय पर ही ध्यान दे पाता है| उन्होंने यह तय किया कि वे कूड़ा बीनने वालों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए काम करेंगी| साल 2004 में, उन्होंने एनजीओ को सोशल इंटरप्राइज़ में परिवर्तित कर दिया| लेकिन इसे पेटेंट करवाने में उन्हें काफी समय लगा| साल 2007 में, वें इसे पेटेंट कराने में सफल रहे|

उन्होंने इंटरनेट से रीसाइक्लिंग टेक्नोलॉजी पर जानकारी हासिल की और अलग-अलग चीजों को करने की कोशिश की| सबसे पहले उन्होंने बुनाई का काम किया और कारपेट्स बनाये| परन्तु यह उत्पाद देखने में बहुत ही साधारण लगते थे, और इन्हे तैयार करने में मेहनत भी अधिक लगती थी| आर्थिक रूप से भी व्यावहारिक नहीं था और उन्हें बेचना भी एक कठिन लक्ष्य था| 

फैशन स्तर पर अपने अनुभव को पहचान अनीता जी ने प्लास्टिक बैग विकसित करने का निर्णय लिया| उन्होंने रूपरेखा बनाई कि पहले वे प्लास्टिक बैग में कलाकृति करेंगी और फिर उसकी प्रदर्शनी लगायेंगी| लेकिन उनके पति को उनकी यह परियोजना कारगर नहीं लगी|

उनके पति शलभ इंजीनियर थे, अब तक वह रिटायर हो गए थें| जब बैग्स बनाने का काम शुरू हुआ, तब उन्होंने खुद प्लास्टिक शीट्स बनाने वाली मशीन बनाई| उन्होंने मशीन के द्वारा बड़े स्तर पर गढ़े हुए प्लास्टिक शीट्स तैयार करवाये| स्वचालित मशीन के द्वारा उसमें कलाकृति बनवाते और फिर उन्हें प्रदर्शनी में लगवाते|

बैग्स तैयार के लिए पतली प्लास्टिक की ज़रूरत होती है| इसे बनाने के लिए प्लास्टिक को पूरी एक प्रक्रिया से गुजरना होता है| इसमें डाई या कलर्स का इस्तेमाल नहीं होता| फ्लास्टिक के जो अपने रंग होते हैं वहीं इसमें निकलकर आते हैं| 

इस प्रक्रिया में पहले कचरे से इकट्ठा किए गए प्लास्टिक वेस्ट से हैंडमेड रिसाइकल्ड प्लास्टिक (HRP) बनाई जाती है|

गंदगी और इंफेक्शन से बचाव के लिए HRP बनाने के लिए पहले प्लास्टिक्स की अच्छे से सफाई की जाती है| 

फिर इसे रंग के हिसाब से अलग किया जाता है और फिर इन रंगो की मिक्सिंग की जाती है| इसके बाद इन प्लास्टिक्स को लेयर्स में एक मशीन में डाला जाता हैं, जो इन्हें कंप्रेस करके रंगीन प्लास्टिक शीट्स तैयार करते हैं|

फिर इन शीट्स से अलग-अलग तरह के बैग्स, क्लचेज़, लैपटॉप बैग्स व फोल्डर्स आदि बनाए जाते हैं|

दिल्ली के प्रगति मैदान में कंजर्व इंडिया ने ट्रेड फेयर में लिया था हिस्सा| 

साल 2003 में उन्होंने ट्रेड फेयर में हिस्सा लिया| जहाँ टेक्सटाइल मंत्रालय ने उन्हें एक छोटा सा बूथ दिया| इस एक छोटे से बूथ ने उनके आइडिया को बड़ी पहचान दिलाई| उन्हें यहां से 30 लाख का ऑर्डर मिला|

अब प्लास्टिक वेस्ट के लिए कूड़ा बीनने वालों को घर-घर जाकर कूड़ा लेना पड़ता था| लेकिन ज़रूरत ज्यादा थी और प्लास्टिक कम ही मिल पाते थे| बैग्स बनाने के लिए विशेष रंग वाले प्लास्टिक की जरुरत होती थी| इसके लिए उन्होंने कबाड़ वालों से सम्पर्क किया और सीधे इंडस्ट्री से भी प्लास्टिक कचरा मंगाने लगे| धीरे-धीरे कंजर्व इंडिया एक ब्रांड बन गया और अब 2020 तक उनका टर्न-ओवर 100 करोड़ तक पहुंच गया है|

मणिपाल यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग और दिल्ली यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद उनकी बेटी कनिका आहूजा भी इस बिजनेस से जुड़ गईं| साल 2017 में उन्होंने बैग्स बेचने के लिए लिफाफा नाम के एक ब्रांड की शुरूआत की| जिसका लेक्मे फैशन वीक (Lakme Fashion Week) ने भी समर्थन किया और दो बार उनका ब्रांड इस फैशन वीक का हिस्सा बना। कनिका ये बिजनेस और इसकी मार्केटिंग का काम संभालती हैं| वहीं अनीता जी कर्मचारियों की ट्रेनिंग और डिज़ाइनिंग का काम देखती हैं|

आज देश ही नहीं विदेशों से भी इन बैग्स की मांग बढ़ रही है| ये बैग्स दिखने में आकर्षक होने के साथ-साथ काफी मजबूत और टिकाऊ भी हैं|

फिलहाल नई तकनीकी को ध्यान में रखते हुए पैकेजिंग मटेरियल की रिसाइकलिंग पर भी काम किया जा रहा है| साथ ही वे पेरिस की ‘फैब-लैब’ से भी बात कर रहे हैं, जो प्लास्टिक रि-साइकिल के लिए नई टेक्नॉलजी का प्रयोग करते हैं| अगर सफलता मिली तो इन प्लास्टिक्स से खिलौने भी बनाए जा सकेंगे| जिससे ज्यादा से ज्यादा वेस्ट प्लास्टिक को पुनः प्रयोग में लाया जा सकेगा|

कंजर्व इंडिया ने कूड़ा बीनने वालों के लिए पहचान नाम से एक सामाजिक अभियान शुरू किया है| ‘कंज़र्व एम्प्लॉई कार्ड्स’ प्रदान करके, कंज़र्व इंडिया समाज में कूड़ा उठाने वालों की आवाज़ को बल दे रहा है| कूड़ा बीनने वालों को मान्यता दिलवाने के इस अभियान में, कंजर्व इंडिया 150,000 से अधिक कूड़ा बीनने वालों को आधिकारिक रूप से रजिस्टर कराने के लिए दिल्ली सरकार को मान्यता प्राप्त कराने की कोशिश कर रहा है| ताकि उन्हें उचित वेतन का अधिकार दिया जा सके|

जब अनीता जी ने कंज़र्व इंडिया की शुरुआत की थी तब उन्हें बहुत सी मुश्किल का सामना करना पड़ता था| आज वह अनगिनत लोगों के लिए मिसाल बन गई हैं| लगन और ईमानदारी से किया गया काम कभी विफल नही होता बस शर्त है निरंतरता और कुछ कर दिखाने का जज्बा|  

अनीता आहूजा के प्रयासों द्वारा उन लोगों के जीवन में परिवर्तन आ रहे है जो लोग देश की सफाई में लगे होने के बावजूद 2 वक्त की रोटी के लिए भी तरसते है| 

Jagdisha अनीता आहूजा के प्रयासों को सलाम करते है, और आपकी उन्नति और प्रगति की कामना करते है| आपके प्रयास उन लोगों को सम्मान से जीने का अधिकार दिला रहे है, जिन्हें शिक्षा के अभाव और भूख ने पिछाड़ रखा है|

 

प्लास्टिक के कूडे-कचरे से फैशन की दुनिया में बनाया 100 करोड़ का टर्नओवर, बदल रही है कूडा बीनने वालो का जीवन

 

 

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