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सपने वो नहीं है जो आप नींद में देखे, सपने वो है जो आपको नींद ही नहीं आने दे – अब्दुल कलाम

लखीमी बरूआ ने 1998 में जोरहाट, असम में कनकलता महिला सहकारी (कोऑपरेटिव) बैंक शुरू किया, जिससे जरूरतमंद और वंचित महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र और सुरक्षित बनाया जा सके |
 
लखीमी बरूआ का जन्म असम के जोरहाट जिले के एक छोटे से गांव में 1949 में हुआ था| उनके जन्म के बाद एक दुःखद घटना घटी कि उनकी माँ परमात्मा में लीन हो गईं| और वह जन्म के बाद से ही माँ के दुलार से वंचित रह गईं|
उनके पिता और परिजनों ने उनके लालन-पालन में पूर्ण भूमिका निभाते हुए उन्हें भरपूर प्रेम के साथ पाला| उनके पिता उनकी हर जरूरत का ख्याल रखते जबकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी |
 
वह पढ़ने में अच्छी थीं, इसलिए उनके पिता ने उनकी शिक्षा के साथ कोई समझौता नही किया| परंतु कई बार परिस्थितियाँ हक में नहीं होतीं| जब वह स्नातक की पढा़ई कर रही थी, आकस्मिक उनके पिता की मृत्यु हो गईं |
 

परिजनों के आर्थिक हालात भी बिगडे हुए थे, मगर उन्होंने अपने सामर्थ के अनुकूल उनका सहयोग करते हुए उन्हें इन विकट परिस्थितियों में किसी भी मनुष्य, खासकर महिलाओं के लिए आर्थिक सुरक्षा की अहमियत का एहसास कराया| परिजनों ने उन्हें आत्मविश्वासी और मजबूत बनाया| किन्तु आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें 1969 में अपना कॉलेज छोड़ना पडा |

 
1973 में उनकी शादी प्रभात बरुआ के साथ हुईं| प्रभात बरुआ सरल, सुलझे हुए और प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्ति थे| उन्होंने लखीमी बरुआ को जीवन मे प्रगतिशील रहने के लिए प्रेरित किया| और उन्हें कॉलेज की उनकी पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रोत्साहित किया| लखीमी बरुआ ने जोरहाट के वाहना कॉलेज से 1980 में अपनी स्नातक की डिग्री प्राप्त की| उसी वर्ष वह ‘डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक’ में अकाउंटेंट मैनेजर पद पर कार्यरत हुईं| और यही से उन्हें अपने जीवन के लक्ष्य को चुनने की प्रेरणा भी मिली जिसमे उनके पति ने भी पूर्ण सहयोग दिया |
 
 
नौकरीकाल में कुछ घटनाएँ, उन्हें बहुत आघात पहुँचाती थी| अक्सर आस-पास के गांवों की गरीब, अशिक्षित औरतें, चाय बागानों में मजदूरी करने वाली महिलाएं घंटों बैंक से ऋण (loan) के लिए लंबी कतार में खामोश खड़ी रहती थीं, और जब काउंटर पर पहुंचतीं, तो उन्हें खाली हाथ लौटा दिया जाता, क्योंकि उनके पास कोई जरूरी दस्तावेज नहीं होता था| लाचार औरतों का गिड़गिड़ाना, उनके आंसू लखीमी बरूआ को झंझोड़ देते थे| किसी को दुखद विवाह से छुटकारा चाहिए होता, तो किसी की अपने बच्चों की शिक्षा हेतु बुहार होती| किंतु वह बैंक के नियम-कानून से बंधी होने के कारण उन महिलाओं की चाहकर भी कुछ मदद नहीं कर सकती थीं |
 
उनकी अंतरात्मा उन्हें उन गरीब, अशिक्षित महिलाओं के लिए कुछ बेहतर अवसर उत्पन्न करने के लिए झंझोड रही थी| इस तरह के लगातार वाक्यो ने उन्हें प्रेरित किया और उन्होंने 1983 में जोरहाट में एक महिला समिति बनाई| इस समिति को कार्यशील करते हुए वह उन महिलाओं के आर्थिक असुरक्षा के कारकों से अवगत हुईं |
 
आसपास के इलाको के चाय बागानों में काम करने वाली महिलाओं की कुछ भी बचत नहीं थी, क्योंकि वे अपनी कमाई घर खर्च में लगा देती और कुछ बचता तो वह राशि उनके पति या घरवाले उनसे माँग लेते थे| अगर कभी उन्हें कोई जरूरत पड़ती, तब उनके पास ऊंची दर पर स्थानीय साहूकारों से कर्ज लेने के अलावा ओर कोई चारा नहीं बचता, क्योंकि दस्तावेजों के अभाव में बैंक से उन्हें ऋण मिलना मुश्किल था| ऋण की आवश्यकता इसलिए भी पड़ती थी, क्योंकि बचत जमा करने की उन महिलाओं में कोई आदत ही नही थी |
 
लखीमी बरूआ ने अपनी बैंक की नौकरी छोड जरूरतमंद महिलाओं की मदद करने के अपने उद्देश्य को स्थितिगत करने हेतु 1990 में कनकलता महिला कोऑपरेटिव बैंक शुरू किया| रजिस्ट्रेशन के लिए उन्हें आठ वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा| अथॉरिटी की कम से कम 1,000 सदस्य और 8,00,000 रुपये की पूंजी की कड़ी शर्त थी |
 
कनकलता नाम उनके पति ने उन्हें सुझाया था| कनकलता बरुआ असम की एक स्वतंत्रता सेनानी हैं जिनकी 17 वर्ष की आयु में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तिरंगा फैराने के कारण गोली मारकर हत्या कर दी गई थी| और लखीमी बरूआ भी स्वातंत्र भारत की महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा का संकल्प ले चुकी थी |
 
दृढ़ संकल्प के साथ निरंतर संघर्ष के समक्ष डटे रह कर लखीमी बरूआ, महिलाओं की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के अपने लक्ष्य तक पहुँच कर ही मानी| घरेलू महिलाओं ने भी इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| महिलाओं ने उन पर विश्वास दिखाते हुए अपनी जमा-पूंजी और बचत से इस कॉपरेटिव के शेयर खरीदे| 22 मई, 1998 में लखीमी बरूआ के कॉपरेटिव बैंक का पंजीकरण हो गया |
 
बैंक की शुरूआत 6 महिला कर्मचारियों के साथ हुईं, जिन्हें एक परीक्षा के माध्यम से और उनकी योग्यता के आधार पर चुना गया था |
 
1999 में उन्होंने 8,45,000 रुपये की पूंजी और 1,420 सदस्य भी जुटा लिए| फरवरी, 2000 में उन्हें, भारतीय रिजर्व बैंक का ‘कमर्शियल बैंकिंग’ संबंधी लाइसेंस भी प्राप्त हो गया |
 
कनकलता महिला कोऑपरेटिव बैंक को महिला कर्मियों द्वारा ही संचालित किया जाता हैं| लखीमी बरूआ न सिर्फ जरूरतमंद महिलाओं को कम ब्याजदर और शर्तो से ऋण उपलब्ध कराती हैं, बल्कि शिक्षित और कार्य दक्ष महिलाओं को रोजगार भी प्रदान कर रही हैं| यहाँ अशिक्षित महिलाओं को फाम भरने में भी बैंक कार्यरत कर्मचारी महिला मदद करती हैं| यहाँ जीरो शेष (balance) खाता या ₹20 से भी खाता खुलवाया जा सकता हैं |
 
अब वहाँ की महिलाएं अपनी बचत को बैंक खाते में जमा करवाती हैं और जरूरत पड़ने पर आसानी से ऋण भी प्राप्त कर पाती हैं| इस बैंक में खाताधारक बहुत छोटी राशि ₹20 भी रोज के जमा करवा सकते हैं, ऐसा नियम इसलिये बनाया गया क्योंकि ज्यादातर खाताधारक महिलाएं मजदूरी का कार्य करती हैं |
 
कनकलता महिला कोऑपरेटिव बैंक की पहली शाखा 2002 में गर-अली में खोली गई थी| इसके अलावा, अब उनकी दो जिलों में तीन और शाखाएँ हैं – जोरहाट (जोरहाट और मरियानी) और शिवसागर (शिवसागर) |
 
पिछले दो दशकों से सिर्फ महिला कर्मियों द्वारा संचालित इस बैंक में 45 हजार से अधिक खाताधारक हैं, जिनमें से ज्यादातर महिलाएं हैं| अब तक 8,000 से अधिक महिलाएं और 1,200 महिला स्वयंसेवी समूह यहाँ से लाभ उठा चुके हैं|
मार्च 2016 में महिला सशक्तिकरण के उनके असाधारण योगदान के लिए पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया |
 
हजारों निर्धन, शिक्षित और अशिक्षित महिलाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन करने वाली लखीमी बरूआ को उनके उत्कृष्ट कार्य को सरहाते हुए इस वर्ष (2021) पद्मश्री से अलंकृत किया गया है |
Jagdisha की ओर से लखीमी बरूआ को सहृदय शुभकामनाएं और नारी सशक्तिकरण को विन्रम प्रणाम |

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