बीना दास एक युवा स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए| जब वह सिर्फ 21 साल की थीं, तब उन्होंने बंगाल के ब्रिटिश गवर्नर स्टेनली जैक्सन की हत्या करने का प्रयास किया| 1960 में, उन्हें सामाजिक कार्यों में योगदान हेतु पद्म श्री से सम्मानित किया गया था|

1986 में 26 दिसंबर को ऋषिकेश में सड़क के किनारे एक क्षत-विक्षत शव मिला था| शव की पहचान करने में पूरे एक महीने का समय लगा – यह कोई ओर नही बल्कि बीना दास का पार्थिव शरीर था।
 
क्रूर विडंबनापूर्ण हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता और संघर्ष के लिए अपनी राजनीतिक और नैतिक प्रतिबद्धता को आजन्म दिया और अपना समुल जीवन भारत माता को समर्पित कर दिया ऐसी भारतीय क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी की मृत्यु अज्ञात, अस्वस्थ और असंगत जैसी दयनीय परिस्थितियों में हुई|
 
बीना दास का जन्म 24 अगस्त 1911 में कृष्णनगर में हुआ था| वह एक प्रसिद्ध ब्रह्म शिक्षक, बेनीमाधब दास और सामाजिक कार्यकर्ता, सरला देवी की बेटी थीं| उनकी बड़ी बहन कल्याणी दास भी एक स्वतंत्रता सेनानी थीं|
 
उनके पिता कटक के रावेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल में शिक्षक थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनके छात्रों में से एक थे|
उनकी माँ सरला देवी ने कलकत्ता में पुण्य आश्रम नामक एक महिला छात्रावास भी चलाया, जो क्रांतिकारियों के उपयोग में आने वाले बम और हथियारों के भंडारण स्थान के रूप में भी प्रयोग होता था| इस छात्रावास के कई निवासी स्वयं क्रांतिकारी थे, जो विभिन्न भूमिगत समूहों से संबंधित थे|
 
वह सेंट जॉन्स डायोकेसन गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल और बेथ्यून कॉलेज, कलकत्ता की छात्रा थीं|
 
1926 में सरतचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखा पाथेर दाबी नामक उपन्यास का प्रथम संस्करण सात दिनों के अंदर बिक गया था| यह पुस्तक एक गुप्त समाज के बारे में है जिसका लक्ष्य भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त करना है| लेकिन ब्रिटिश सरकार द्वारा इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया|
 
 
हालांकि, युवा लड़की बीना दास ने उस प्रतिबंधित पुस्तक की एक प्रति प्राप्त कर ली थी| उन्हें उस वर्ष अपनी मैट्रिक परीक्षा लिखने थी, लेकिन परीक्षा की तैयारी करने के बजाय, उन्होंने वह पुस्तक पढ़ना जारी रखा जब तक उसे पढ़ कर समाप्त न कर दिया| जिसके परिणाम रूप उनकी परीक्षा की तैयारियां प्रभावित हुई|
 
उनकी अंग्रेजी परीक्षा में छात्रों को उनके पसंदीदा उपन्यास के बारे में लिखने के लिए कहा गया| और वह, जो कक्षा में प्रथम स्थान पर रहती थी, ने पाथेर दाबी पर एक निबंध लिखा| जब परिणाम घोषित किए गए, तो उन्होंने पाया कि इस परीक्षा में उसके अंक पर्याप्त नहीं थे| क्योंकि उन्होंने एक प्रतिबंधित उपन्यास पर निबंध लिखा था| यह समझने में उन्हें देर नहीं लगी कि उनके निबंध का सही मूल्यांकन नहीं किया गया है|
वह समय था जब बीना दास ने ठाना और अपने देश को बहुत कुछ वापस देने की कसम खाई थी| और परीक्षा में वह जो अंक खो चुकी थीं, वह उनके देश के लिए पहली श्रद्धांजलि थी|
 
1928 में, सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित बंगाल वालंटियर कोरपस् में शामिल हो गईं| उस समय उनकी एक कॉलेज सहपाठी, क्रांतिकारी सुहासिनी गांगुली, ने पूछा कि क्या वह अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए ‘कुछ वास्तविक’ करने में रुचि रखती है| जब बीना दास ने सकारात्मक जवाब दिया, तो सुहासिनी गांगुली ने उन्हें बंगाल रिवोल्यूशनरी पार्टी से मिलवाया| यह समूह इतना गोपनीय था कि कई सदस्यों को एक-दूसरे के असली नाम भी नहीं पता थे| बीना ने पाया कि अनुजा चरण सेन और दिनेश चंद्र मजुमदार उस समूह का हिस्सा थे, जिन्होंने 25 अगस्त 1930 को, कलकत्ता के पुलिस आयुक्त चार्ल्स टेगार्ट को मारने का एक असफल प्रयास किया, जो कि पकड़े गए क्रांतिकारियों को यातना देने के लिए कुख्यात था|
 
औपनिवेशिक कानून प्रवर्तन उस हत्या के प्रयास के कारण टूट गया, जिस कारण समूह तितर-बितर हो गया| कई सदस्यों को गिरफ्तार कर किया गया|
 
बीना दास कलकत्ता के डायोकेसन कॉलेज की छात्रा थी| बीना दास ने जाना कि बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन कलकत्ता विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह में भाग लेंगे| गवर्नर स्टेनली जैक्सन ऑल इंग्लैंड क्रिकेट टीम के कप्तान भी रह चुके थे|
उस समय बीना दास ने बंगाल के गवर्नर की हत्या का प्रयास करने का फैसला किया| उन्होंने बंदूक हासिल करने के लिए जुगान्तर पार्टी की कमला दासगुप्ता से संपर्क किया| कमला के साथी क्रांतिकारी सुधीर घोष ने 280 रुपये की राशि से एक पुराने जमाने की बेल्जियन, पांच-कक्षीय रिवाल्वर खरीदी|
 
बीना दास को रिवाल्वर चलाने का कोई अनुभव नहीं था और न ही, उन्होंने कोई अभ्यास किया था|
 
6 फरवरी 1932 को कलकत्ता विश्वविद्यालय का वार्षिक दीक्षांत समारोह था| हॉल उन छात्रों के साथ जमा था, जो अपनी डिग्री प्राप्त करने के लिए बेसबरी से इंतजार कर रहे थे| लेकिन बीना दास की तो कुछ अलग ही योजना थी|
 
बंगाल के ब्रिटिश गवर्नर स्टेनली जैक्सन नये स्नातकों के भरे हॉल में भाषण दे रहे थे| तभी बीना दास ने अपने स्नातक गाउन में छुपाई हुईं एक लोडेड रिवॉल्वर निकाली और गवर्नर पर निशाना साध गोली चला दी| लेकिन उनका वार खाली गया और गोली कान ले छू कर निकल गई|
 
तुरंत कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति हसन सुहरावर्दी ने छलांग लगाई और बीना दास को गर्दन से पकडते हुए दबोच लिया| फिर भी वह जमीन पर कुश्ती करने से पूर्व शेष सभी गोलियों का निर्वहन करती रही परंतु दुर्भाग्य से उनमें से कोई भी गोली सही निशाने पर नहीं लगी|
 
उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और भीषण पूछताछ की गईं लेकिन उन्होंने अपने सह-क्रांतिकारीओं का नाम नही बताया| और उन्हें 9 साल की कैद हुईं|
 
मिदनापुर जेल में, जहाँ उन्हें उनका कार्यवास पूरा करने के लिए भेजा गया था, वहाँ खराब परिस्थितियों का विरोध करने के लिए उन्होंने भूख हड़ताल की| और सात दिनों के बाद, अधिकारियों ने उसकी मांगें मान लीं|
 
1939 में, महात्मा गांधी उनकी रिहाई कराने में सफल हुए और रिहा होते ही, बीना दास कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गईं| 1941 में उन्हें पार्टी के दक्षिण कलकत्ता अधिवेशन के प्रमुख रूप में नियुक्त किया गया और फिर उन्होंने मजदूरों के हित में आंदोलन आयोजित किए|
 
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन हिस्सा लेते हुए, बीना दास ने पुलिस के आदेशों के उल्लंघन में दक्षिण कलकत्ता के हाजरा क्रॉसिंग में एक सार्वजनिक बैठक बुलाई| जैसे ही बैठक आगे बढ़ी, एक पुलिस बल इसे तोड़ने के लिए आ गया। इस बीच एक हवलदार ने उनके एक साथी को डंडे से मारने का प्रयास किया, उन्होंने उसे रोकने की कोशिश की| जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें 3 साल की दुबारा कैद हुईं|
 
रिहाई के बाद उन्होंने, 1946 से 1951 तक, बंगाल राज्य की विधायिका के रूप में सेवा दी|
 
1947 में, उन्होंने अपने स्वतंत्रता सेनानी साथी जतीश भौमिक से शादी की|
 
बीना दास और उनके पति ने स्वतंत्रता-सेनानी पेंशन लेने से इंकार कर दिया था| बीना दास अपना कुछ समय स्कूलों में पढ़ाने में गुजारती| 1986 में उनके पति की मृत्यु के बाद, उन्होंने स्वयं को अलग कर लिया और अपने करीबी दोस्तों या परिवार से मिलने से भी इंकार कर दिया| अंततः उन्होंने कलकत्ता छोड़ दिया और ऋषिकेश में चली गई, जहाँ वह दरिद्रता में रहती थी|
 
26 दिसंबर 1986 को, वह सड़क के किनारे मृत पाईं गई थी| उनका शरीर सड़न की ऐसी उन्नत अवस्था में था कि पुलिस को उसकी पहचान स्थापित करने में एक महीने से अधिक समय लग गया| बंगाल की बहादुर बेटी बेघर और दरिद्रता में अपने अंतिम दिवस समाप्त कर परमात्मा में लीन हुईं|
 
Jagdisha का इस बहादुर बेटी को शत शत नमन|

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