slum girl chandni

हम सभी ने अक्सर सड़को, रेलवे-स्टेशन, बस-स्टैंड आदि जगहों पर भीख मांगते, फूल बेचते, पत्रिकाओं को बेचते, कूड़ा बीनते हुए बहुत से बच्चो को देखा है और सभी रोज़ देखते रहते होंगे और हम ज्यादातर उन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं |

पर शायद ही किसी ने उनसे ये जानने की कोशिश को हो की वो खुद क्या चाहते हैं, वो काम वो खुद अपनी मर्जी से कर रहे हैं या उनके हालात उनसे करवा रहे हैं | ऐसे तमाम बच्चे हैं जिनका भविष्य इन्हीं सड़कों पर शुरू होता है और इन्हीं सड़कों पर ख़त्म हो जाता है, लेकिन वो कहते हैं न होंसलों की उड़ान परों से तेज़ होती है|

वैसे तो हर बच्चे में कुछ न कुछ अलग करने की क्षमता होती है बशर्ते उसकी क्षमताओं का सही आंकलन किया जाये और उसका उचित मार्गदर्शन किया जाये तो उसे उड़ान भरने से कोई नहीं रोक सकता |

आज हम आपको एक ऐसी लड़की की कहानी बताने जा रहे हैं जिसकी रौशनी ने उन सेंकडों बच्चों के जीवन में अँधेरा दूर करने का काम किया और कर रही है |

मात्र 20 वर्ष और छोटे कद की ये लड़की जिसके होंसले के आगे आसमान भी झुक  गया उनका नाम है चांदनी

हम जिनकी बात कर रहे है उनका नाम है चांदनी खान| चांदनी खान ने आज से लगभग डेढ़ साल पहले “ voice of slum ” नाम की संस्था की स्थापना की थी|

यह है एक दुख की भयावहता की कहानी, आशा और धीरज से भरा एक वर्तमान और ऐसा एक भविष्य जो पहले से अधिक उज्ज्वल होने का होसला रखता है।

चांदनी खान के बचपन से लेकर पहली बार पेंसिल पकड़ने तक का सफ़र

चांदनी खान जो खुद भी झुग्गी-बस्ती से ही तालुक रखती हैं |उनका जन्म मथुरा में हुआ था | उन्होंने भी बाकि उन बस्तियो के बच्चो की तरह कम उम्र में ही अपने पिता के साथ कमाई करना शुरू कर दिया था| 5 साल की उम्र से ही वो एक गाँव से दूसरे गाँव और एक शहर से दूसरे शहर जा-जाकर अपने पिता के साथ सड़कों पर खेल-तमासा, जादू , नृत्य और सांप का खेल जैसे काम किया करती थी, यहां तक कि देर रात तक भी काम करने से पीछे नही हटती थी| ऐसे ही जीवनरूपी गाड़ी सही चल रही थी क्योकि दो वक्त का खाना तो आराम से मिल रहा था| किन्तु समय ने उन्हें एक नया ही रूप दिखाया और जीवन की वह परिस्थितियां एक जैसी नही रही क्योकि उनके पिता का असामयिक निधन हो गया| जिसके कारण उनके परिवार की जिम्मेदारी का भार उन पर आ गया|

7 साल की बच्ची पर समय ने ऐसी मार मारी जिसकी कल्पना भी शायद उसने नही की थी| पर कहते है न समय के सामने किसी की नही चलती |अपने परिवार की मूल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उस बच्ची ने दूसरे लोगो के साथ और औरतो के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया, जिससे दिन में उन्हें 30 रुपये मिलने लगे व कभी कभी तो उन्हें उनकी हिस्से की रोज की कमाई भी नही मिलती थी |

लेकिन वह जीवन के संघर्ष से डरी नही और अपने परिवार के लिए उन्हें बुरी परिस्थिति से भी गुज़ारना पड़ा, उन्हें कूड़ा तक बीनना शुरू कर दिया| उसमे भी उन्हें बहुत सी परेशानियो का सामना करना पड़ा, कभी उनके पीछे कुत्ते पड़ जाते जो उन्हें काट भी लेते थे, लोगो के अप-शब्द भी सुनने पड़ते थे| क्योकि वो सिर्फ सात साल की ही थी इसलिए पुलिस वाले भी मार्किट में जाने नही देते थे|

एक ऐसी घटना जो किसी भी छोटे बच्चे की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डाल सकती है| उन्हें एक दिन चोरी के आरोप के कारण जेल तक  जाना पड़ा, वो चोरी जो उन्होंने की ही नही थी| यह उनके जीवन की डरावनी घटना में से एक है|

फिर एक ओर हादसा उनके साथ हुआ दिल्ली जाने के लिए वो एक गाड़ी में बैठी पर उस गाड़ी वाले ने उनके अलावा किसी ओर सवारी को नही बैठाया और वह मंडी के रास्ते को छोड़ कर किसी दूसरे रास्ते से जा रहा था| उस गाड़ी वाले ने उनसे कहा तुम्हे कितने पैसे चाहिए, जितने तू रोज कमाती है उससे ज्यादा दूंगा,मासूम सी बच्ची को कुछ समझ नही आ रहा था वह रोने लगी और गाड़ी पिटनी शुरू कर दी| उस मासूम की मासुमियत पर शायद भगवान को रहम आ गया और वह बच गई क्योकि उस रास्ते पर DND था| जिसे देख कर वह आदमी उन्हें बीच रास्ते में छोड़ कर भाग गया|

अब चांदनी ने अपना काम बदल दिया, और अब वह सड़को पर और रेड-लाइट के पास फूल बेचना शुरू कर दिया, फूल बेचने के लिए वो 2 बजे का इंजार करती थी क्योकि मॉल और पब जादातर उसी समय बंद होते हैं और वहाँ से निकलने वाले अधिकतर फूल खरीद लिया करते थे| देर रात तक फूल बेचने में सबसे ज्यादा परेशानी उन्हें सर्दियो में हुआ करती थी क्योकि जो कपडे वह पहने होतीं थी वे उन्हें सर्दी से बचाने के लिए काफी नही होते थे| सर्दी से बचने के लिए वह कभी दो कारो के बीच छूटी जगह पर बैठती तो कभी दिवार से सट कर बैठती |

चांदनी हिम्मत नहीं हार रही थी एक बार फिर उन्होंने अपना काम बदला अब वह भुट्टा (corn) बेचने लगी, जिसके कारण उनके हाथ और कपडे जादातर जले हुए रहते थे |

भाग्य वश उनकी मुलाकात कुछ गैर सरकारी संगठन स्वयंसेवकों से हुई जो मलिन बस्तियों के बच्चों को शिक्षित कर रहे थे| उस संगठन के साथ मिलकर काम करने लगी, उन्होंने चांदनी को उनके जैसे बच्चो को उनके के साथ जोड़ने के लिए कहाँ और वह बच्चो को ले कर आने लगी| फिर उस संगठन ने उन्हें पढने का मौका दिया| उस समय वह 10 साल की थी पर उन्हें पेंसिल भी पकड़ना नही आता था |

यहाँ से चांदनी के जीवन में बदलाव की शुरुआत होने लगी | वह संगठन की गतिविधिओ में भाग लेने लगी और अब अपने जीवन में एक रोशनी की किरण उन्हें नजर आने लगी| शिक्षा के उज्जाले में उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य मिल गया था |

जीवन में बदलाव की शुरुवात

उस NGO से जुड़ने के एक महीने लगातार काम करने के बाद चांदनी का दखिला एक open school में हुआ और उनकी मूल शिक्षा की शुरुवात हुए| वह 10 साल की चांदनी खान जिन्हें पेंसिल पकड़ना भी नही आता था आज 20 साल की हो गई है और फ़िलहाल वह 11 कक्षा की छात्रा हैं|

NGO की कार्यशाला में उन्होंने भाग लिया जहाँ उन्होंने बच्चो के क़ानूनी अधिकारों के बारे में सिखा और उन्हें पता चला की पुलिस वाले किसी बच्चे को जेल में नही बंद कर सकते| बच्चा दोषी हो या निर्दोष उसे जेल में नही रखा जा सकता|

उनके जीवन की अब पहली चुनौती उनके सामने थी, उन्होंने अकेले ही उन बच्चो की मदद करने की ठानी जिन्हें पुलिस पकड़ कर ले जाती| कुछ बच्चो को चोरी के इल्जाम में जेल में बंद कर दिया गया था| उन्हें आप बीती याद और उन्होंने उस दिन की भयावहता को याद किया, जब वह जेल में थी| वह 10 साल की बच्ची अकेले पुलिस स्टेशन गई और उन बच्चो को रिहा करवा कर लाई |यह उनके जीवन का सबसे बेहतरीन क्षण हैं|

उनकी प्रतिभा और कार्य को देखते हुए उस संगठन की एक संस्था है बढ़ते कदम वह उससे जुड़ी| यही से उनके जीवन का एक मत्वपूर्ण मोड़ शुरु हुआ और उन्होंने उनके जैसे बच्चो को शिक्षा के उजाले में लाने को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया|

उन्होंने अपने समुदाय के सदस्यों को प्रोत्साहित किया और बहुत से माता पिता को समझाया व शिक्षा का महत्व बताया जिससे वे अपने बच्चो की शिक्षा के प्रति सजग हो|

उन्होंने बढ़ते कदम के लिए काम करना जारी रखा, और नए शिक्षा केन्द्र खोलने में उनकी मदद की तथा उनके साथ ओर अधिक बच्चों को जोड़ा। जल्द ही, उन्हें  जिला सचिव नियुक्त किया गया और फिर उन्हें राष्ट्रीय सचिव के रूप में पदोन्नत किया गया|

अब चांदनी को बालाकनामा नामक अखबार से जुड़ने का मौका मिला | हमेशा कुछ नया सीखने की उनकी उत्सुकता के कारण ही वह ने उन्हें बालाकनामा की पत्रकार बनी, झुग्गी बच्चों की मजबूरी से भरी कहानियों को सामने ले कर आईं और उनके काम की काफी सराहना हुई।उन्होंने सड़क के बच्चों, यौन उत्पीड़न, बाल श्रम, पुलिस क्रूरता, साथ ही साथ आशा और सकारात्मक बदलाव की कहानियों की कई कहानियां लिखी हैं|

अब अंग्रेजी संस्करण में भी यह अखबार छपना शुरू हो गया, उन्होंने अपनी प्रतिभा और उपलब्धियों के बल पर इस अख़बार का परिसंचरण 2000 से 5000 तक बढ़ा दिया।

उन्होंने इस अख़बार की मदद से झुग्गी-बस्तियो के बच्चो की आवाज सरकार और समाज तक पहुँचने की कोशिश की और उन बच्चो के अधिकार के लिए लडती रही| फिर उन्हें उस अख़बार की संपादक के रूप में नियुक्त कर लिया गया|

उन्होंने 10,000 बच्चो के लिए काम किया| उन्होंने बच्चो के लिए 4 राज्यों में काम किया था| क्योकि वह बच्चो के साथ काम करती थी तो कुछ प्रसिद्ध और बड़े लोगो से मिलने का मौका भी मिला|

चांदनी खान को उनके काम के लिए कर्मवीर चक्र अवार्ड भी मिला हैं|

उन्होंने CRY NGO, Save the children NGO, PLAN NGO, UNCRC और NCPCR के साथ भी अपने जैसे बच्चो के लिए काम किया हैं|

भारत के लाइव शो जैसे रेडियो मिर्ची, इंडिया टुडे और फिर बेंगलुरु की एक प्रतिष्ठित TedTalks में भी अपने विचारो को सामने रखा

वह TedTalks स्पीकर और जोश स्पीकर बन झुग्गी-बस्तियो के बच्चो के जीवन  उनकी आशाओ को अपनी जीवनी के साथ व्यक्त किया|

अपने इस सफ़र में बच्चो की शिक्षा और उनकी उन्नती के लिए काम करते करते अब वह 18 साल की हो गई, तब उनके जीवन में एक ओर नया बदलाव आया क्योकि उन्हें उस संगठन को छोडना पड़ा| वह संगठन केवल 18 वर्ष की आयु से कम बच्चो के लिए ही काम करता है| जिन्दगी ने चांदनी फिर से उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया लेकिन चांदनी अब शसक्त हो चुकी उसके इरादे मजबूत हो चुके थे |

संगठन से अलग होने पर एक बार तो उन्हें ये एहसास हुआ जैसे जहाँ से उन्होंने शुरुवात की थी वो फिर वही खड़ी हैं| एक बार फिर उनके सामने वही हाताल आ गये जिन्हें, वो पीछे छोड़कर बहुत आगे बढ़ चुकी थी| समय का ऐसा पलट वार की फिर से उन्हें भुट्टा बेचना पड़ा| इस कारण मन में हजारो सवाल भी आते थे, और एक दिन बिरला कंपनी वालो ने उन्हें देखा और उनकी कंपनी में जॉब भी दी| वह उस जॉब से अपना जीवन सहजता से जी सकती थी, परन्तु मन की उधेड़ बुन ने उन्हें कभी स्थिर नही होने दिया| अपने जैसे बच्चो के जीवन में बदलाव लाने की उनकी चाह और उनके लिए कुछ करने की अपनी सोच को उन्होंने दबने नही दिया| उन्होंने अपनी जॉब छोड़ दी और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ी| कहते है न जो अपनी मदद करना जानते है भगवान भी उनकी मदद जरुर करते है| हर परेशानियो और बुरे हालात से बिना डरे लड़ी और अपने साहस व दृढ़ सकल्प से एक संस्था की संस्थापक बन कर बच्चों को शिक्षित कर उनका भविष्य उज्जवल कर रही है |

उन्होंने एक समूह बनाया जिसमे उन्ही के जैसे बच्चे शामिल थे, वे सभी जिन्हें काम करना आता था| और फिर अपने मित्र देव प्रताप सिंह के साथ मिलकर झुग्गी-बस्तिओं के बच्चों के लिए नॉएडा में एक Voice of Slum नाम से स्वयंसेवी संस्था की स्थापना की|

यह NGO उन सभी के लिए एक सूरज की किरणों के सामान फैलाती रोशनी की तरह है जिन्हें उनके हालात ने एक अंधकारमय जीवन जीने के लिए बाधित किया हुआ है|

इसका मुख्य उद्देश्य झुग्गी-बस्तियो और सड़को पर घुमने वाले बच्चों को स्वास्थ्य, शिक्षा और आश्रय जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करना है।

उन्होंने पहले बस्तियो के पास सडको पर खेलते हुए बच्चो को अपने साथ जोड़ना शुरू किया और उन बच्चो में शिक्षा के प्रति रूचि को बढ़ाती है और उनमें आत्मनिर्भरता का प्रसार करती हैं|

ऐसे बच्चे जिनका जीवन भीख मांगने, फूल, पेन, और खिलौने आदि बेचने के इर्द-गिर्द घुमती रहती है| जिन्हें जीवन के दूसरे अच्छे पहलू के बारे में कुछ पता ही नही होता| चांदनी और उनकी पूरी टीम उन्हें उस अच्छे पहलू से मिलवाते है|

जिस प्रकार एक कुम्हार अपने द्वारा बनाये गये बर्तन और खिलौनों को आग में पकाकर उन्हें स्थिर करता है और फिर रंगों से सजाता है उसी प्रकार वह भी इन बच्चो के व्यक्तित्व को शिक्षा के उजाले द्वारा निखार रही हैं|

शिक्षा के साथ साथ वह बच्चो में निहित और भी बहुत सी प्रतिभा को बढ़ावा देती है| उसके लिए नृत्य, संगीत आदि की शिक्षा भी दी जाती है साथ ही में आत्मरक्षा के दाव-पेंच भी सिखाये जाते है|

साथ ही में उनकी यह भी कोशिश रहती है कि वह बड़े बच्चो को रोजगार के अवसर प्रदान करवा सके जिसे उन्हें सड़को पर भीख न मांगनी पड़े|  Voice of Slum एक पत्रिका भी निकालता है जिसका नाम है Voice Post.

इस पत्रिका की महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पत्रिका के पत्रकार और संपादक सब यहाँ के बच्चे ही है| इस पत्रिका के माध्यम से ये बच्चे हमारे सामाज और सरकार को यह बताने और समझाने की कोशिश करते है की उनका इस सामाज को देखने का क्या नजरिया हैं| वह क्या सोचते है और क्या चाहते है यह सब वे इस पत्रिका में सामाज और सरकार को बताते है|

यह पत्रिका हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओ में छपती है, हिंदी में बच्चे खुद लिखते है और अंग्रेजी में परिवर्तित की जाती है |

Voice of Slum के माध्यम से अब तक चांदनी व उनकी team ने अब तक 500 से भी अधिक बच्चों को झुग्गी बस्तियों में से बहार निकाल शिक्षित कर आत्मनिर्भर बना दिया है |

यदि आप भी चांदनी की इस कार्य में किसी भी तरह का सहयोग करना चाहते हैं तो आप Voice of Slum के facebook पेज पर जाकर संपर्क कर सकते हैं |

Jagdisha, चांदनी और उनकी आत्मनिर्भर टीम के साहस और समाज को बदलने के जज़्बे को सलाम करता है  और उम्मीद करता है कि आपकी सार्थक पहल से देश के सभी झुग्गी बस्तियों में अत्याचार की आग में झुलस रहे बच्चों को Voice of Slum के माध्यम से शिक्षा प्रदान कर आत्मनिर्भर बनेंगें और निश्चित रूप से समाज के लोग आपके कार्य से प्रेरित होंगे |

यदि आपके आस – पास ऐसी ही कोई महिला जिन्होंने अपने मेहनत और हिम्मत से समाज को परिवर्तित किया है तो आप हमें मेल कर सकते हैं हम उसे समाज के सामने लायेंगे |  हमारी मेल आईडी है : connect.jagdisha@gmail.com  या आप हमें फेसबुक पर भी भेज सकते है  हमारी फेसबुक आईडी जाने के लिए यहाँ क्लिक करें : Jagdisha Facebook

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